पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर ईरान की संभावित भागीदारी पर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उसे इस समझौते में शामिल होने का कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है।
Iran on Mecca Pact: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए नए रक्षा समझौते को लेकर पश्चिम एशिया में रणनीतिक समीकरणों पर चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या ईरान भी इस त्रिपक्षीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। अब ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस संभावना को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने कहा कि तेहरान को फिलहाल ‘मक्का समझौते’ में शामिल होने का कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर इन देशों के साथ बातचीत के प्रस्ताव जरूर दिए गए हैं। बकाई के मुताबिक, ईरान क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता से जुड़े विषयों पर संबंधित देशों के साथ संवाद के लिए तैयार है। उनके बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान इस नए रक्षा ढांचे को करीब से देख रहा है, लेकिन अभी इसका औपचारिक सदस्य बनने की स्थिति में नहीं है।
क्या है मक्का रक्षा समझौता?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच 7 अगस्त को मक्का में रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, सुरक्षा समन्वय और सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना है। समझौते के अनुसार, किसी एक हस्ताक्षरकर्ता देश पर होने वाले सशस्त्र हमले को तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
हालांकि, समझौते में किसी संभावित हमले की स्थिति में विस्तृत सैन्य कार्रवाई या ऑपरेशनल व्यवस्था का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है। इसके बावजूद इसे तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पश्चिम एशिया में क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?

मक्का समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया लंबे समय से युद्ध, क्षेत्रीय तनाव और बदलते सुरक्षा समीकरणों से जूझ रहा है। ईरान, सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले देशों के बीच संबंधों में बदलाव का असर पूरे क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में ईरान का इस समझौते से बाहर रहना और साथ ही क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता के लिए तैयार रहना एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। तेहरान लंबे समय से यह कहता रहा है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के समाधान में बाहरी शक्तियों की बजाय क्षेत्रीय देशों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए इस्माइल बकाई ने पहले भी क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को लेकर ईरान का दृष्टिकोण सामने रखा था। उन्होंने संकेत दिया था कि पश्चिम एशिया के देशों को अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे तंत्र विकसित करने चाहिए, जिनमें क्षेत्रीय देशों की केंद्रीय भूमिका हो। ईरान की चिंता मुख्य रूप से क्षेत्र में बदलते सैन्य गठबंधनों और सुरक्षा व्यवस्थाओं से जुड़ी है। तेहरान का मानना रहा है कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच संवाद और सहयोग आवश्यक है।
हूती हमलों के बाद गठबंधन की भूमिका पर सवाल
मक्का समझौते को लेकर चर्चा के बीच यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से जुड़े हमलों ने भी इस नए सुरक्षा ढांचे की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में सऊदी अरब के जाज़ान क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख किया गया है। कुछ विश्लेषणों में सवाल उठाया गया है कि यदि नए रक्षा गठबंधन के किसी सदस्य पर हमला होता है तो समझौते के तहत वास्तविक सैन्य प्रतिक्रिया किस तरह होगी। समझौते में सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत तो शामिल है, लेकिन उसके व्यावहारिक सैन्य क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नहीं है।
फिलहाल ईरान को मक्का रक्षा समझौते में शामिल करने का कोई औपचारिक प्रस्ताव सामने नहीं आया है। खुद ईरानी विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है। हालांकि, क्षेत्रीय सुरक्षा पर बातचीत के प्रस्तावों का उल्लेख बताता है कि तेहरान पूरी तरह संवाद से दूर नहीं है। यदि भविष्य में ईरान, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ता है, तो पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल मक्का समझौता तीन देशों तक सीमित है और ईरान का रुख सदस्यता के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद पर केंद्रित दिखाई दे रहा है।









