इजराइल चुनाव से पहले नेतन्याहू की बढ़ी चिंता, सर्वे में पूर्व सेना प्रमुख आइजेनकोट आगे

इजराइल के आगामी चुनाव से पहले PM बेंजामिन नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सर्वे मे पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की यशार पार्टी को 25 सीटे है

इजराइल के आगामी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। ताजा सर्वे में पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की यशार पार्टी को 25 सीटें, जबकि लिकुड को 21 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

तेल अवीव: इजराइल में आगामी संसदीय चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने राजनीतिक चुनौती बढ़ती दिखाई दे रही है। ताजा जनमत सर्वे में पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की पार्टी यशार को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से बढ़त मिलती नजर आ रही है। सर्वे के मुताबिक, यशार को 25 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि लिकुड 21 सीटों पर रह सकती है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ सप्ताह में सामने आए कई सर्वेक्षणों में दोनों दलों के बीच मुकाबला बेहद करीबी था। कुछ सर्वे में लिकुड और यशार लगभग बराबरी पर थीं, जबकि कुछ में आइजेनकोट की पार्टी को केवल एक या दो सीटों की बढ़त मिली थी। ताजा सर्वे में चार सीटों का अंतर सामने आने से चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

27 अक्टूबर के चुनाव से पहले बदले राजनीतिक समीकरण

इजराइल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अभियान तेज कर रहे हैं। ऐसे समय में सर्वेक्षणों में यशार का आगे निकलना नेतन्याहू के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

हालांकि, केवल सबसे बड़ी पार्टी बन जाना सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। इजराइल की राजनीतिक व्यवस्था गठबंधन आधारित है। इसलिए चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों के समर्थन की जरूरत होगी।

ताजा सर्वे के मुताबिक, आइजेनकोट की यशार सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, लेकिन नेतन्याहू विरोधी पूरे खेमे को अभी बहुमत हासिल होता नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद गठबंधन की राजनीति निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीट जरूरी

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है और इसमें कुल 120 सीटें होती हैं। किसी भी सरकार को बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।

सर्वे में नेतन्याहू विरोधी दलों के संभावित ‘चेंज ब्लॉक’ को करीब 58 सीटें मिलने का अनुमान है। यानी यह खेमे बहुमत के आंकड़े से केवल तीन सीट दूर दिखाई देता है।

दूसरी ओर नेतन्याहू के समर्थक दलों को लगभग 50 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब राजनीतिक दलों को कुल 12 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। इनमें राम पार्टी और हदाश-ताल को छह-छह सीटें मिलने का अनुमान है।

इस गणित से साफ है कि मौजूदा अनुमान किसी भी राजनीतिक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं दे रहे हैं। ऐसे में चुनाव के बाद छोटी पार्टियां और संभावित गठबंधन सरकार गठन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

आइजेनकोट ने सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लेकर कही बड़ी बात

सर्वे में बढ़त मिलने के बाद गादी आइजेनकोट की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। आइजेनकोट पहले इजराइल के सेना प्रमुख रह चुके हैं और सुरक्षा मामलों के अपने अनुभव के कारण उन्हें महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरा माना जाता है।

आइजेनकोट का कहना है कि यदि नेतन्याहू विरोधी गठबंधन चुनाव के बाद सरकार बनाने की स्थिति में आता है, तो प्रधानमंत्री पद का अवसर उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जिसकी पार्टी उस गठबंधन में सबसे बड़ी हो।

उनका यह रुख इजराइल की गठबंधन राजनीति के पुराने उदाहरणों को भी सामने लाता है। देश में पहले भी ऐसा हो चुका है कि सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता के बजाय गठबंधन समझौते के आधार पर किसी दूसरे नेता को प्रधानमंत्री बनाया गया हो।

नफ्ताली बेनेट का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?

इस संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। 2021 में बेनेट की पार्टी के पास नेसेट में केवल सात सीटें थीं। इसके बावजूद उन्होंने कई दलों के समर्थन से गठबंधन सरकार बनाई और प्रधानमंत्री पद संभाला।

उस समय उनका प्रधानमंत्री बनना इजराइल की गठबंधन व्यवस्था की जटिलता का उदाहरण बना था। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करना महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के लिए पर्याप्त नहीं।

यही वजह है कि आइजेनकोट की पार्टी अगर सबसे बड़ी पार्टी बनती है, तो भी उन्हें सरकार बनाने के लिए अन्य दलों का समर्थन जुटाना होगा।

विपक्षी खेमे में भी प्रधानमंत्री पद को लेकर दावेदारी

आइजेनकोट की बढ़त के बीच विपक्षी राजनीति के भीतर भी नेतृत्व को लेकर सवाल बने हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री याइर लैपिड की पार्टी बीयाचद ने संकेत दिया है कि वह नेतन्याहू विरोधी सरकार के गठन में बाधा नहीं बनेगी।

हालांकि, जब लैपिड से पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन करेगी, तो उन्होंने स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

बीयाचद का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के हाथों में है। बेनेट भी प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में शामिल रहे हैं। इसलिए चुनाव के बाद विपक्षी खेमे में प्रधानमंत्री पद को लेकर बातचीत भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

आइजेनकोट की सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

आइजेनकोट की राजनीतिक सक्रियता के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता सामने आई है। इजराइली मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान की ओर से इजराइली राजनीतिक और सैन्य नेताओं को निशाना बनाने के संभावित खतरे को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू को पहले से ही सरकारी सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन आइजेनकोट को उसी स्तर की औपचारिक सुरक्षा हासिल नहीं है। उनकी बढ़ती राजनीतिक भूमिका को देखते हुए इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट उनकी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर विचार कर रही है।

हालांकि, सुरक्षा से जुड़ी ऐसी रिपोर्टों के बारे में आधिकारिक जानकारी और वास्तविक खतरे का आकलन अलग-अलग हो सकता है। चुनावी अभियान के दौरान किसी प्रमुख राजनीतिक नेता की सुरक्षा स्वाभाविक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन जाती है।

इजराइल में जनता सीधे प्रधानमंत्री को वोट नहीं देती

इजराइल की चुनावी व्यवस्था भारत या कुछ अन्य देशों से अलग है। वहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को वोट नहीं देते। इसके बजाय वे राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं।

पूरे देश को एक ही राष्ट्रीय चुनाव क्षेत्र माना जाता है। पार्टियों को मिले वोट के अनुपात के आधार पर नेसेट की 120 सीटों का बंटवारा होता है। इसके बाद राजनीतिक दल सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन और समर्थन हासिल करने की कोशिश करते हैं।

जिस नेता के पास नेसेट में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन होता है, वह सरकार बनाने की स्थिति में आता है और प्रधानमंत्री बन सकता है। इसलिए चुनाव में सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाली पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बने, यह जरूरी नहीं है।

चुनाव से पहले नेतन्याहू के सामने दोहरी चुनौती

ताजा सर्वे नेतन्याहू के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी लिकुड पार्टी फिलहाल यशार से पीछे दिखाई दे रही है। हालांकि, चुनाव में अभी समय बाकी है और इस दौरान राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं।

नेतन्याहू की सबसे बड़ी ताकत उनके समर्थक दलों का गठबंधन है। यदि ये दल पर्याप्त सीटें हासिल करते हैं और छोटे दलों का समर्थन जुटाने में सफल रहते हैं, तो लिकुड के पास सरकार बनाने का रास्ता खुला रह सकता है।

दूसरी ओर आइजेनकोट के नेतृत्व में विपक्षी दलों को अगर 61 सीटों का समर्थन जुटाने में सफलता मिलती है, तो इजराइल की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।

आगे की रणनीति होगी निर्णायक

आगामी चुनाव में केवल नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच व्यक्तिगत मुकाबला नहीं होगा। असली लड़ाई 120 सीटों वाले नेसेट में बहुमत जुटाने की होगी। इसलिए आने वाले सप्ताहों में राजनीतिक गठबंधन, छोटे दलों की रणनीति और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों के बीच समझौते महत्वपूर्ण होंगे।

फिलहाल सर्वेक्षण में आइजेनकोट की यशार चार सीटों की बढ़त के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई है। लेकिन बहुमत से अभी काफी दूर होने के कारण चुनाव का अंतिम परिणाम गठबंधन की गणित पर निर्भर करेगा।

27 अक्टूबर के मतदान तक अगर यह बढ़त कायम रहती है, तो नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो सकती है। हालांकि, इजराइल की गठबंधन आधारित राजनीति को देखते हुए किसी भी संभावित सत्ता परिवर्तन का फैसला केवल सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि चुनाव के बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरणों से होगा।

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