जयपुर निकाय चुनाव में 9 सितंबर को 18 निकायों और 11 सितंबर को नगर निगम के 150 वार्डों में मतदान होगा। 14 सितंबर को नतीजे आएंगे। मेयर का चुनाव 21 और डिप्टी मेयर का चुनाव 22 सितंबर को पार्षद करेंगे।
जयपुर: राजस्थान में निकाय चुनाव का कार्यक्रम जारी होने के साथ ही जयपुर जिले में चुनावी गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से घोषित कार्यक्रम के अनुसार जयपुर जिले की 19 निकायों में अलग-अलग चरणों में मतदान कराया जाएगा। पहले चरण में 9 सितंबर को दो नगर परिषदों और 16 नगर पालिकाओं के लिए वोट डाले जाएंगे। इसके बाद 11 सितंबर को जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों के पार्षदों के चुनाव के लिए मतदान होगा।
नगर निकाय चुनाव को लेकर तारीखों की घोषणा के साथ ही संबंधित क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। चुनाव कार्यक्रम सामने आने के बाद राजनीतिक दलों ने भी संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।
14 सितंबर को आएगा पार्षदों का चुनाव परिणाम
जयपुर जिले की निकायों में पार्षद पद के लिए होने वाले चुनाव के परिणाम 14 सितंबर को घोषित किए जाएंगे। नगर निगम के 150 वार्डों में मतदाता अपने-अपने क्षेत्र के पार्षद का चुनाव करेंगे। मतदान का समय सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक निर्धारित किया गया है।
इसके बाद नगर निगम के मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। मेयर का चुनाव 21 सितंबर को और उप महापौर का चुनाव 22 सितंबर को कराया जाएगा। इन दोनों पदों के लिए सीधे जनता मतदान नहीं करेगी। निर्वाचित पार्षद ही अपने बीच से मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव करेंगे।
मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव के लिए मतदान सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक होगा। मतदान समाप्त होने के बाद उसी दिन परिणाम घोषित कर दिया जाएगा।
करीब 24 लाख मतदाताओं की नजर मेयर चुनाव पर
जयपुर नगर निगम का चुनाव इस बार राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जयपुर शहर में बड़ी संख्या में मतदाता अपने पार्षद चुनेंगे और अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया के जरिए अगला मेयर तय करने में भी उनकी भूमिका होगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 24 लाख मतदाता जयपुर शहर के अगले मेयर के चुनावी समीकरण का हिस्सा होंगे।
चूंकि मेयर का चुनाव निर्वाचित पार्षदों के जरिए होना है, इसलिए वार्ड चुनाव के परिणाम के बाद राजनीतिक दलों के लिए बहुमत जुटाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। पार्षदों की संख्या और उनका राजनीतिक समर्थन ही मेयर पद के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
150 वार्डों में आरक्षण की तस्वीर साफ
जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों में आरक्षण की व्यवस्था भी तय की जा चुकी है। इनमें 30 वार्ड अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के लिए, 20 वार्ड अनुसूचित जाति के लिए और छह वार्ड अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा 63 वार्ड अनारक्षित श्रेणी में रखे गए हैं।
अनारक्षित महिला वर्ग के लिए 31 वार्ड निर्धारित किए गए हैं। कुल मिलाकर 50 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। वार्डों के आरक्षण की यह व्यवस्था चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इसी आधार पर विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों का चयन करेंगे।
मेयर पद सामान्य ओपन, दावेदारों की दौड़ तेज
निकाय प्रमुखों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जयपुर नगर निगम के मेयर पद की स्थिति भी स्पष्ट हो गई है। इस बार मेयर पद सामान्य ओपन श्रेणी में रखा गया है। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दलों के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं तेज होने की संभावना है।
सामान्य ओपन सीट होने के कारण कई नेताओं के लिए मेयर पद की दावेदारी का रास्ता खुल गया है। वार्ड आरक्षण के आधार पर पार्षद पद के उम्मीदवार तय होने के बाद राजनीतिक दल मेयर चुनाव के लिए अपने समर्थक पार्षदों की संख्या और संगठनात्मक ताकत को ध्यान में रखकर रणनीति बनाएंगे।
जयपुर में मेयर पद का रहा है लंबा राजनीतिक इतिहास
जयपुर नगर निगम का मेयर पद लंबे समय से शहर की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता आया है। पिछले कई दशकों में इस पद पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का प्रभाव रहा है। कई ऐसे नेता भी रहे हैं, जिनके राजनीतिक करियर को नगर निगम की राजनीति से आगे बढ़ने का अवसर मिला।
1994 में मोहनलाल गुप्ता जयपुर के पहले बीजेपी मेयर बने और 1999 तक पद पर रहे। इसके बाद निर्मला वर्मा मेयर बनीं। कार्यकाल के दौरान उनके निधन के बाद शील धाभाई ने मेयर की जिम्मेदारी संभाली।
2004 में अशोक परनामी जयपुर के मेयर बने। बाद में उनके विधायक चुने जाने के बाद डिप्टी मेयर पंकज जोशी ने मेयर पद संभाला। इसके बाद 2014 से 2019 के बीच बीजेपी के निर्मल नाहटा, अशोक लाहोटी और विष्णु लाटा मेयर रहे।

राजनीतिक घटनाक्रम के बीच बदले मेयर
2014 के चुनाव के बाद निर्मल नाहटा जयपुर के सातवें मेयर बने थे। बाद में दिसंबर 2016 में राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उन्हें पद से हटाया गया और अशोक लाहोटी को मेयर बनाया गया। वर्ष 2018 में सांगानेर से विधायक चुने जाने के बाद लाहोटी ने मेयर पद छोड़ दिया।
इसके बाद बीजेपी से बगावत कर चुनाव लड़ने वाले विष्णु लाटा को कांग्रेस के समर्थन से मेयर बनने में सफलता मिली। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार मनोज भारद्वाज को चुनाव में हराया था। यह घटनाक्रम जयपुर नगर निगम की राजनीति में दलगत समीकरणों की अहमियत को दिखाता है।
कांग्रेस भी मेयर पद पर दर्ज कर चुकी है जीत
जयपुर में कांग्रेस भी मेयर पद पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। प्रत्यक्ष महापौर चुनाव में कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल ने बीजेपी की सुमन शर्मा को हराकर मेयर पद हासिल किया था। उस समय नगर निगम बोर्ड में बीजेपी का प्रभाव कायम रहा था।
इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जयपुर नगर निगम को जयपुर हेरिटेज और जयपुर ग्रेटर में विभाजित कर दिया गया। इसके बाद जयपुर हेरिटेज में कांग्रेस की मुनेश गुर्जर मेयर बनीं, जबकि जयपुर ग्रेटर में बीजेपी की सौम्या गुर्जर ने मेयर पद संभाला।
मुनेश गुर्जर के निलंबन के बाद कुसुम यादव को कार्यवाहक मेयर की जिम्मेदारी दी गई थी। इस दौर में जयपुर नगर निगम की राजनीति प्रदेश की राजनीति से भी जुड़ी रही।
मेयर पद से विधानसभा तक पहुंचे कई नेता
जयपुर की स्थानीय राजनीति का असर कई बार विधानसभा चुनावों में भी दिखाई दिया है। नगर निगम की राजनीति से जुड़े कई नेताओं को बाद में विधानसभा चुनाव लड़ने का अवसर मिला। सुरेंद्र पारीक, अर्चना शर्मा, विक्रम सिंह राठौड़ और मानसिंह राठौड़ जैसे जयपुर के पार्षद रहे नेताओं को राजनीतिक दलों ने विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया।
इनमें सुरेंद्र पारीक और मानसिंह राठौड़ विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक भी बने। यही वजह है कि जयपुर का मेयर पद केवल स्थानीय प्रशासन का पद नहीं माना जाता, बल्कि इसे कई नेताओं के बड़े राजनीतिक करियर की संभावित सीढ़ी के तौर पर भी देखा जाता है।
चुनावी तारीखों के साथ बढ़ी राजनीतिक हलचल
अब राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद जयपुर में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने वाली हैं। 9 सितंबर को जिले की 18 निकायों में मतदान और 11 सितंबर को जयपुर नगर निगम के 150 वार्डों में मतदान के बाद 14 सितंबर को परिणाम सामने आएंगे।
इसके बाद 21 सितंबर को मेयर और 22 सितंबर को डिप्टी मेयर का चुनाव होगा। इस तरह पार्षद चुनाव से लेकर मेयर चुनाव तक करीब दो सप्ताह तक जयपुर की राजनीति में लगातार हलचल बनी रहने की संभावना है।
मेयर पद सामान्य ओपन होने के कारण इस बार मुकाबले में कई नए चेहरे सामने आ सकते हैं। बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए वार्ड चुनाव के साथ-साथ मेयर पद के लिए पार्षदों का समर्थन जुटाना अहम होगा। चुनाव परिणाम के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि जयपुर नगर निगम की सत्ता किस राजनीतिक दल के हाथ में जाती है और शहर को नया मेयर कौन मिलता है।












