संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने 7 जनवरी को एक अहम बैठक आयोजित की, जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों द्वारा जेल से सरकार चलाने की स्थिति से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह बैठक 31 सदस्यीय JPC की तीसरी औपचारिक बैठक थी।
नई दिल्ली: संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने बुधवार, 7 जनवरी को अपनी तीसरी अहम बैठक आयोजित की, जिसमें 31 सदस्यों वाली इस समिति ने करीब तीन घंटे तक तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तृत चर्चा की। ये विधेयक ऐसे प्रावधानों से जुड़े हैं जिनके तहत लगातार 30 दिनों तक जेल में रहने की स्थिति में भी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा सरकार चलाने से संबंधित नियम तय किए गए हैं।
बैठक में 130वां संविधान संशोधन विधेयक 2025, जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 तथा केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक 2025 की गहन समीक्षा की गई।
किन विधेयकों पर हुई चर्चा?
JPC की इस बैठक में कुल तीन विधेयकों की समीक्षा की गई:
- 130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025
- जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025
- केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025
इन विधेयकों का केंद्रीय उद्देश्य यह तय करना है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्रीय/राज्य मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होता है और लगातार 30 दिनों तक न्यायिक या पुलिस हिरासत में रहता है, तो उसकी संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति क्या होगी। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई मंत्री गिरफ्तारी के बाद 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे 31वें दिन अपने पद से इस्तीफा देना अनिवार्य होगा। यदि वह स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं देता, तो उसे स्वतः ही पद से हटा दिया जाएगा।

“जेल से सरकार चलाना लोकतंत्र का अपमान”
बैठक के बाद JPC अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने कहा कि कुछ राजनीतिक दलों को इस बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि लोकतंत्र जैसे गंभीर विषय पर चर्चा से दूर रहना जिम्मेदार राजनीति का संकेत नहीं है।
सारंगी ने कहा, “सरकार कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहती है, जबकि कुछ राजनीतिक दल कानून से बाहर रहकर सरकार चलाने की मानसिकता रखते हैं। जेल से सरकार चलाना लोकतंत्र के लिए अत्यंत अपमानजनक है।” उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है।
विपक्ष की आपत्ति और मांग
बैठक के दौरान विपक्षी दल के एक सांसद ने मांग उठाई कि इन विधेयकों पर विचार-विमर्श के लिए विपक्षी सांसदों को भी पर्याप्त अवसर दिया जाए, ताकि वे अपने सुझाव और आपत्तियां समिति के समक्ष रख सकें। उनका तर्क था कि यह मुद्दा केवल सरकार या सत्ता पक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा हुआ है। हालांकि, समिति की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि आगे की बैठकों में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।
इन तीनों विधेयकों को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अगस्त 2025 में लोकसभा में पेश किया था। सरकार का कहना है कि इन प्रस्तावों का मकसद किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में स्पष्टता, जवाबदेही और संवैधानिक मर्यादा सुनिश्चित करना है। सरकार के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि लंबे समय तक हिरासत में रहता है, तो वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन प्रभावी ढंग से नहीं कर सकता। ऐसे में स्पष्ट कानूनी प्रावधान होना आवश्यक है।











