सौरभ राजपूत हत्याकांड में मृत्युदंड सुनाने वाले जज बोले, समाज में विश्वास बहाल करना कोर्ट की जिम्मेदारी

सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड सुनाया गया। जानें, अदालत ने सामाजिक विश्वास और कानून-व्यवस्था पर क्या कहा।

मेरठ की अदालत ने सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड सुनाया। फैसले में न्यायालय ने सामाजिक विश्वास, कानून-व्यवस्था और व्यवस्था बनाए रखने में आपराधिक न्याय प्रणाली की भूमिका पर जोर दिया।

मेरठ: सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड सुनाते हुए मेरठ की जिला अदालत ने समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी को रेखांकित किया। फैसले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और महाभारत के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए न्याय, सामाजिक स्थिरता और कानून-व्यवस्था के महत्व को समझाया गया। दोनों दोषियों को साक्ष्य मिटाने के मामले में भी सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत ने सामाजिक विश्वास पर दिया जोर

मेरठ की जिला अदालत ने सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड सुनाते हुए न्याय व्यवस्था की व्यापक जिम्मेदारी पर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल अपराध के लिए दंड देना नहीं, बल्कि समाज में स्थिरता, व्यवस्था और कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी है।

फैसले में उल्लेख किया गया कि अपराध से समाज में भय का माहौल पैदा हो सकता है और सामाजिक चेतना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में न्यायालयों को व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करने के साथ समाज तथा राज्य के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना होता है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एडक्कंडी दिनेशन उर्फ पी. दिनेशन बनाम केरल राज्य मामले, 2025 INSC 28 का हवाला देते हुए न्यायपालिका की इस भूमिका को रेखांकित किया। फैसले में सामाजिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली के प्रति विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

महाभारत के श्लोक से समझाया कानून और समाज का संबंध

अपने फैसले में अदालत ने महाभारत के एक श्लोक का भी उल्लेख किया, जिसमें वन और बाघ के परस्पर संरक्षण की बात कही गई है। श्लोक का भाव यह है कि वन और बाघ एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए जरूरी हैं और दोनों की रक्षा की जिम्मेदारी परस्पर जुड़ी हुई है।

न्यायालय ने इस उदाहरण के माध्यम से कानून और समाज के बीच संबंध को समझाया। कानून समाज की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने का माध्यम है, जबकि कानून के प्रति लोगों का विश्वास और सम्मान न्याय प्रणाली को मजबूत करता है।

इस टिप्पणी में सामाजिक स्थिरता और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण बताया गया। अदालत के अनुसार, आपराधिक न्याय व्यवस्था में दोषियों को दंडित करने के साथ नागरिकों के अधिकारों और समाज के हितों का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

हत्या के मामले में मृत्युदंड, साक्ष्य मिटाने पर सात साल की सजा

अदालत ने साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1) के साथ धारा 3(5) के तहत हत्या का दोषी मानते हुए मृत्युदंड सुनाया। दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में प्रत्येक दोषी को पांच महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

साक्ष्य मिटाने के अपराध में भी दोनों को भारतीय न्याय संहिता की धारा 238(ए) के तहत सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इस मामले में दोनों पर 20-20 हजार रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना अदा नहीं करने पर एक-एक महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मृत्युदंड का निष्पादन उच्च न्यायालय की पुष्टि के अधीन रहेगा। इस प्रकार, फैसले में हत्या और साक्ष्य मिटाने के अपराधों के लिए अलग-अलग सजाएं निर्धारित की गई हैं।

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