Justice Bhuyan: जनइच्छा से मिलती है शासन की वैधता, जस्टिस भुइयां ने रूसो के विचारों से जोड़ा लोकतंत्र

Justice Ujjal Bhuyan ने लोकतंत्र और शासन की वैधता पर बोलते हुए रूसो की Social Contract Theory का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने का अधिकार जनता की

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक कार्यक्रम में स्विस-फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो की ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत के अनुसार इंसान स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन समाज के विकास के साथ उसकी स्वतंत्र इच्छा पर कुछ सामाजिक पाबंदियां लग जाती हैं।

Justice Ujjwal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने लोकतंत्र, नागरिकता और मतदान के अधिकार पर चर्चा करते हुए दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो की सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शासन करने की वैधता किसी दैवीय अधिकार से नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक इच्छा से आती है। उनके संबोधन में आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद और भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तक पहुंचने के ऐतिहासिक सफर पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

रूसो की सोशल कॉन्ट्रैक्ट थ्योरी का जिक्र

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यह बात तेलंगाना स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वीं NALSAR जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में कही। उन्होंने रूसो के राजनीतिक दर्शन को समझाते हुए बताया कि सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत उस पुरानी धारणा को चुनौती देता है, जिसके अनुसार राजाओं को शासन करने का अधिकार ईश्वर से प्राप्त होता है।

रूसो के विचारों के मुताबिक राजनीतिक व्यवस्था की वैधता जनता की सामूहिक इच्छा से आती है। यानी कानून और शासन की शक्ति का अंतिम आधार नागरिकों की सहमति और उनकी सामूहिक इच्छा होनी चाहिए। जस्टिस भुइयां ने इसी विचार को लोकतांत्रिक शासन की मूल अवधारणा से जोड़कर समझाया।

फ्रांसीसी क्रांति से जुड़े रूसो के विचार

जस्टिस भुइयां ने कहा कि रूसो की 1762 में प्रकाशित ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ ने राजनीतिक चिंतन को प्रभावित किया और फ्रांसीसी क्रांति के लिए महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रेरणा प्रदान की। रूसो ने स्वतंत्रता और समानता जैसे विचारों पर जोर दिया, जिनका प्रभाव आगे चलकर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दिखाई दिया।

रूसो का प्रसिद्ध विचार था कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सामाजिक व्यवस्था में प्रवेश करने के बाद उस पर कई तरह की सीमाएं लग जाती हैं। उनके दर्शन में नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और सामूहिक इच्छा को राजनीतिक व्यवस्था के केंद्र में रखा गया।

नागरिकता और वोट के अधिकार का संबंध

जस्टिस भुइयां ने राज्य, नागरिकता और मतदान के अधिकार के बीच संबंध पर भी बात की। उन्होंने 1930 के दशक के मोंटेवीडियो कन्वेंशन का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी राज्य की पहचान के लिए निश्चित भू-भाग, स्थायी आबादी, सरकार और संप्रभुता जैसी बुनियादी विशेषताएं आवश्यक मानी गईं। उन्होंने कहा कि समय के साथ स्थायी आबादी की अवधारणा नागरिकता से जुड़ी और नागरिकता ने आगे चलकर मतदान के अधिकार का रास्ता बनाया। उनके मुताबिक सैद्धांतिक रूप से नागरिकता और वोट देने का अधिकार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का सफर

जस्टिस भुइयां ने भारत में मतदान के अधिकार के ऐतिहासिक विकास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में वयस्क मताधिकार की शुरुआती अवधारणा 1895 के भारत का संविधान विधेयक, जिसे स्वराज बिल के नाम से भी जाना जाता है, में दिखाई देती है। इसके बाद 1916 के लखनऊ समझौते और 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट जैसे घटनाक्रमों के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और मतदान के अधिकार पर बहस आगे बढ़ी। 

हालांकि उस दौर में वोट देने का अधिकार व्यापक नहीं था और उम्र, संपत्ति, कर, लिंग तथा अन्य योग्यताओं के आधार पर लोगों को इससे बाहर रखा जाता था। 1928 की नेहरू रिपोर्ट में भी सभी वयस्कों के लिए मतदान के अधिकार की मांग को प्रमुखता दी गई। इसके बाद 1931 के कराची प्रस्ताव में भविष्य के भारत के संविधान को वयस्क मताधिकार पर आधारित करने की दिशा स्पष्ट की गई।

आजादी से पहले सीमित था मतदान का अधिकार

जस्टिस भुइयां ने बताया कि 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत मतदान का अधिकार कुछ भारतीय नागरिकों तक सीमित था। निवास, संपत्ति, कर, शिक्षा और अन्य योग्यताओं के आधार पर मतदाता तय किए जाते थे। उस समय देश की कुल आबादी का केवल एक सीमित हिस्सा ही चुनाव में मतदान कर सकता था।

इसके विपरीत स्वतंत्र भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत के साथ की। इसका अर्थ है कि वयस्क नागरिकों को लिंग, जाति, धर्म, संपत्ति या सामाजिक स्थिति जैसी शर्तों के आधार पर अलग किए बिना मतदान का अधिकार दिया गया।

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