कानपुर किडनी कांड में बड़ा खुलासा: फरार मास्टरमाइंड रोहित गिरफ्तार, खुद को डॉक्टर बताता था 

उत्तर प्रदेश के कानपूर किडनी कांड का फरार मास्टरमाइंड रोहित गिरफ्तार। 25 हजार का इनामी आरोपी खुद को डॉक्टर बताकर दिल्ली से सिंडिकेट चला रहा था, पूछताछ जारी।

किडनी कांड में फरार 25 हजार का इनामी मास्टरमाइंड रोहित गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपी खुद को डॉक्टर बताकर अवैध किडनी ट्रांसप्लांट सिंडिकेट चला रहा था। पुलिस उससे पूछताछ कर रही है।

कानपुर: उत्तरप्रदेश के चर्चित अवैध किडनी ट्रांसप्लांट मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। इस मामले के कथित मास्टरमाइंड रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया है, जो लंबे समय से फरार चल रहा था और जिस पर 25 हजार रुपए का इनाम घोषित था। पुलिस ने आरोपी को गाजियाबाद से हिरासत में लेकर कानपुर पहुंचाया है, जहां उससे गहन पूछताछ की जा रही है। शुरुआती जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि खुद को डॉक्टर बताने वाला रोहित वास्तव में केवल 12वीं पास है।

यह मामला भारत में अवैध अंग प्रत्यारोपण नेटवर्क, निजी अस्पतालों की निगरानी और चिकित्सा तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पुलिस का दावा है कि आरोपी लंबे समय से एक संगठित सिंडिकेट के जरिए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का नेटवर्क चला रहा था।

30 मार्च को हुआ था किडनी रैकेट का खुलासा

इस पूरे मामले का खुलासा 30 मार्च को हुआ, जब कानपुर के कल्याणपुर स्थित अहूजा हॉस्पिटल में अवैध रूप से किडनी ट्रांसप्लांट किए जाने की जानकारी पुलिस को मिली। छापेमारी और जांच के दौरान पुलिस को ऐसे सबूत मिले, जिनसे संकेत मिला कि अस्पताल के भीतर नियमों को दरकिनार कर मरीजों और डोनर्स के दस्तावेजों में हेरफेर कर ऑपरेशन किए जा रहे थे।

मामले में अस्पताल संचालक दंपति डॉ. सुरजीत अहूजा और प्रीति अहूजा समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनके अलावा दलाल शिवम काना और अन्य सहयोगियों को भी जेल भेजा जा चुका है। अब तक इस केस में 10 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

रोहित पर था पूरे सिंडिकेट को संचालित करने का आरोप

जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में रोहित का नाम सामने आया था। पुलिस का कहना है कि रोहित दिल्ली से पूरे नेटवर्क का संचालन करता था। वह डोनर और रिसीवर की व्यवस्था, फर्जी कागजात, अस्पतालों से संपर्क और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता था।

पुलिस को यह भी जानकारी मिली थी कि रोहित के साथ मेरठ के एक डॉक्टर और दिल्ली के एक ओटी टेक्नीशियन की भी भूमिका संदिग्ध है। इन लोगों पर भी इनाम घोषित किया गया था। अधिकारियों का मानना है कि यह नेटवर्क केवल एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि कई राज्यों तक फैला हो सकता है।

खुद को डॉक्टर बताता था, लेकिन निकला 12वीं पास

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि रोहित के पास कोई वैध मेडिकल डिग्री नहीं थी। पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि वह केवल 12वीं पास है, लेकिन खुद को डॉक्टर बताकर अस्पतालों और मरीजों के बीच भरोसा बनाता था।

जांच में पुलिस को रोहित की कई तस्वीरें मिली हैं, जिनमें वह गले में स्टेथोस्कोप, एप्रन और सर्जिकल ड्रेस में नजर आ रहा है। कुछ तस्वीरों में वह ऑपरेशन थिएटर के भीतर चिकित्सा कर्मियों के साथ दिखाई दे रहा है।

यह खुलासा स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल उठाता है कि आखिर बिना डिग्री और लाइसेंस के कोई व्यक्ति इतने लंबे समय तक संवेदनशील चिकित्सा प्रक्रियाओं से कैसे जुड़ा रहा।

गाजियाबाद से गिरफ्तारी, कानपुर में पूछताछ जारी

पुलिस की विशेष टीमें कई दिनों से आरोपी की तलाश में लगी थीं। तकनीकी निगरानी, कॉल रिकॉर्ड और संभावित ठिकानों पर छापेमारी के बाद रविवार रात रोहित को गाजियाबाद से पकड़ा गया। सोमवार को पुलिस उसे कानपुर लेकर पहुंची।

कानपुर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और डीसीपी वेस्ट की निगरानी में आरोपी से पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, रोहित से पूछताछ में कई अहम जानकारियां मिली हैं, जिनमें सिंडिकेट की कार्यप्रणाली, फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क, अस्पतालों की भूमिका और संभावित सहयोगियों के नाम शामिल हैं।

अवैध अंग प्रत्यारोपण नेटवर्क पर बढ़ी चिंता

अवैध किडनी ट्रांसप्लांट जैसे मामलों में अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को लालच देकर या मजबूरी का फायदा उठाकर डोनर बनाया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के नेटवर्क सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं।

भारत में अंग प्रत्यारोपण को लेकर सख्त कानूनी प्रावधान हैं। इसके बावजूद फर्जी पहचान, बिचौलियों और निजी अस्पतालों की मिलीभगत से अवैध रैकेट सामने आते रहे हैं। कानपुर का यह मामला दिखाता है कि तकनीकी निगरानी और नियामक तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है।

पुलिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर सकती है बड़े खुलासे

पुलिस अधिकारियों ने संकेत दिया है कि पूछताछ पूरी होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मामले से जुड़े बड़े खुलासे किए जा सकते हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क से कितने मरीज जुड़े थे, कितने अवैध ट्रांसप्लांट हुए और किन-किन शहरों में इसका असर था।

यह भी जांच की जा रही है कि क्या फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड, पहचान पत्र और आर्थिक लेनदेन के लिए किसी बड़े संगठित अपराध नेटवर्क की मदद ली गई थी।

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