आरव नाम का एक 8 साल का लड़का था। उसे नई-नई चीज़ें बनाने का बहुत शौक था। उसके घर के पीछे एक पुराना गैरेज था, जो आरव के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं था। वहाँ टूटी हुई साइकिलें, पुराने रेडियो, जंग लगे डिब्बे और तारों का ढेर लगा रहता था। आरव हमेशा सोचता था, 'काश! मेरा कोई ऐसा दोस्त होता जो मेरे सारे काम कर देता, ताकि मैं दिन भर खेल सकूँ।'
रोबोट बनाने का मिशन एक रविवार की सुबह, आरव ने ठान लिया कि वह एक रोबोट बनाएगा। वह गैरेज में गया और अपने 'मिशन' में जुट गया।
उसने एक पुराने टोस्टर को रोबोट का सिर बनाया। दो खराब टॉर्च उसकी आँखें बनीं। वॉशिंग मशीन के पुराने पाइप उसके हाथ बने और स्प्रिंग वाले गद्दे के तार उसके पैर। पेट के लिए उसने एक पुराना टिन का डिब्बा इस्तेमाल किया।
पूरा दिन मेहनत करने के बाद, शाम को रोबोट तैयार था! वह थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा था और चलते समय 'चर्र-मर्र' की आवाज़ करता था। आरव ने उसका नाम रखा, 'टिल्लू'।
आरव ने अंतिम तार जोड़ा और एक बटन दबाया। टिल्लू की टॉर्च वाली आँखें जल उठीं। उसने एक अजीब सी आवाज़ निकाली, 'बीप-बूप-झनझन!'
कामचोर रोबोट आरव बहुत खुश हुआ। उसने टिल्लू को पहला आदेश दिया, 'टिल्लू! मेरा कमरा बहुत बिखरा हुआ है। जाओ, सारे खिलौने उठाकर टोकरी में डाल दो।'
टिल्लू 'बीप-बूप' करता हुआ कमरे में गया। आरव बाहर इंतज़ार कर रहा था कि अब उसका कमरा साफ़ हो जाएगा। लेकिन तभी अंदर से ज़ोर-ज़ोर से हंसने और चीज़ें गिरने की आवाज़ें आने लगीं।
आरव दौड़कर अंदर गया। उसने देखा कि टिल्लू खिलौने उठाने के बजाय उन्हें हवा में उछाल रहा था! उसने आरव की फुटबॉल को अपने सिर (टोस्टर) पर बैलेंस करने की कोशिश की और धड़ाम से गिर पड़ा।
आरव ने अपना सिर पीट लिया। उसने कहा, 'अरे नहीं टिल्लू! खेलना नहीं है, काम करना है!'
आरव ने फिर कोशिश की। 'अच्छा टिल्लू, चलो मेरा गणित का होमवर्क कर दो।' उसने टिल्लू को कॉपी और पेंसिल पकड़ाई। टिल्लू ने पेंसिल पकड़ी, लेकिन सवाल हल करने के बजाय, उसने पूरे पन्ने पर टेढ़े-मेढ़े गोले और कार्टून बना दिए और खुशी से ताली बजाने लगा।
अनोखी दोस्ती आरव को गुस्सा आने लगा। 'तुम कैसे रोबोट हो? तुम तो कोई काम ही नहीं करते! मैंने तुम्हें मदद के लिए बनाया था, सरदर्दी के लिए नहीं।'
आरव नाराज़ होकर कोने में बैठ गया। टिल्लू ने देखा कि उसका दोस्त उदास है। वह धीरे-धीरे 'चर्र-मर्र' करता हुआ आरव के पास गया। उसने अपने स्प्रिंग वाले हाथ से आरव को गुदगुदी की।
आरव अपनी हंसी नहीं रोक पाया। उसने टिल्लू को धक्का दिया, तो टिल्लू एक मज़किया गेंद की तरह लुढ़क गया। यह देखकर आरव जोर से हँसा।
फिर क्या था! आरव काम-वाम सब भूल गया। उसने टिल्लू के साथ 'पकड़म-पकड़ाई' खेलना शुरू कर दिया। वे पूरे घर में दौड़े। उन्होंने तकियों का किला बनाया और उसके पीछे छिप गए। टिल्लू छिपने में बहुत कच्चा था, उसकी एंटीना हमेशा बाहर दिख जाती थी।
निष्कर्ष शाम को जब मम्मी घर आईं, तो घर पहले से भी ज़्यादा बिखरा हुआ था। लेकिन उन्होंने देखा कि आरव और उसका अजीब सा रोबोट ज़मीन पर लेटे ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे।
उस रात आरव ने अपने होमवर्क खुद किया और अपना कमरा भी खुद ही ठीक किया। उसे समझ आ गया था कि टिल्लू काम करने वाला रोबोट नहीं है। उसने एक नौकर बनाना चाहा था, लेकिन उसे एक सबसे अच्छा 'खेलने वाला दोस्त' मिल गया था। और सच तो यह है, उसे इसकी ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
इस कहानी से सीख
'कभी-कभी जो चीज़ें हमारे प्लान के मुताबिक काम नहीं करतीं, वे हमें उससे भी बेहतर परिणाम देती हैं जिसकी हमने उम्मीद की थी। सच्ची दोस्ती किसी भी काम से ज़्यादा कीमती होती है।'











