यह कहानी हमें जीवन के एक बहुत बड़े सच से रूबरू कराती है कि केवल तेज़ होना ही काफी नहीं है, बल्कि निरंतरता और धैर्य भी सफलता के लिए अनिवार्य हैं। यह हमें सिखाती है कि अति-आत्मविश्वास और आलस कैसे एक विजेता को भी हरा सकते हैं, जबकि धीमी लेकिन स्थिर चाल हमें मंज़िल तक पहुँचा देती है।
कहानी
एक बहुत ही सुंदर जंगल था, जहाँ हर तरफ हरियाली और शांति थी। उसी जंगल में एक खरगोश रहता था, जिसे अपनी तेज़ रफ़्तार पर बहुत घमंड था। वह जंगल के हर जानवर का मज़ाक उड़ाता था जो उससे धीरे चलते थे। एक दिन खरगोश की नज़र एक कछुए पर पड़ी, जो अपनी धीमी चाल से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा था।
खरगोश ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, 'कछुए भाई, इतनी धीमी रफ्तार से तुम कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे। क्या यह समय की बर्बादी नहीं?'
कछुए ने शांति से मुस्कराते हुए कहा, 'मित्र, रफ्तार नहीं, लगन मायने रखती है। अगर इरादा सच्चा हो तो रास्ता खुद बन जाता है। तुम्हें अगर अपनी फुर्ती पर भरोसा है, तो चलो एक प्रतियोगिता कर लेते हैं।'
खरगोश ने सोचा कि यह तो बहुत ही आसान जीत होगी। उसने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली। जंगल के बाकी जानवर भी यह रोमांचक दौड़ देखने के लिए इकट्ठा हो गए। दौड़ की एक मंज़िल तय की गई—जंगल के दूसरी ओर स्थित एक बरगद का पुराना पेड़।
जैसे ही दौड़ शुरू हुई, खरगोश बिजली की गति से भागा और देखते ही देखते आँखों से ओझल हो गया। कछुआ अपनी वही पुरानी धीमी और स्थिर चाल से चलता रहा। कुछ दूर जाने के बाद खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा, उसे कछुआ कहीं नज़र नहीं आ रहा था। खरगोश ने मन ही मन सोचा, 'उस सुस्त कछुए को यहाँ तक पहुँचने में तो घंटों लगेंगे। क्यों न मैं इस ठंडी छाँव में थोड़ी देर सुस्ता लूँ? मेरी रफ़्तार इतनी तेज़ है कि मैं पलक झपकते ही मंज़िल छू लूँगा।'
यह सोचकर खरगोश एक घने पेड़ के नीचे लेट गया। ठंडी हवा चल रही थी और खरगोश को गहरी नींद आ गई। उधर, कछुआ बिना रुके, बिना थके अपनी चाल से निरंतर चलता रहा। वह रास्ते में कहीं नहीं रुका, न ही उसने पीछे मुड़कर देखा। उसे बस अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा था।
जब कछुआ उस पेड़ के पास पहुँचा जहाँ खरगोश सो रहा था, तो उसने देखा कि खरगोश मजे से खर्राटे ले रहा है। कछुआ बिना शोर किए चुपचाप आगे बढ़ गया। कुछ देर बाद खरगोश की आँख खुली। उसने घबराकर पीछे देखा, पर कछुआ कहीं नहीं था। उसे लगा कछुआ अभी भी पीछे ही होगा। वह पूरी ताकत लगाकर मंज़िल की ओर भागा।
लेकिन जब वह बरगद के पेड़ के पास पहुँचा, तो उसके होश उड़ गए। कछुआ पहले से ही वहाँ मौजूद था और जीत की रेखा पार कर चुका था। जंगल के सभी जानवर कछुए की जय-जयकार कर रहे थे। खरगोश का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि घमंड और आलस ने उसे हरा दिया है, जबकि कछुए के अटूट संकल्प और निरंतर प्रयास ने उसे विजेता बना दिया।
सीख
इस कहानी से हमें यह अनमोल सीख मिलती है कि 'धीमी और निरंतर चाल ही दौड़ जीतती है।' (Slow and steady wins the race). सफलता पाने के लिए केवल प्रतिभा या तेज़ होना ही काफी नहीं है, बल्कि अपने लक्ष्य की ओर बिना रुके और बिना अहंकार के निरंतर बढ़ते रहना सबसे ज़रूरी है।













