अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को Board of Peace में शामिल होने का न्योता दिया है। गाजा शांति योजना के तहत भारत की संभावित भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
World News: मिडिल ईस्ट में शांति बहाली को लेकर अमेरिका की नई पहल ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक अहम वैश्विक कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था Board of Peace में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण भेजा है। इस पहल का मकसद गाजा संघर्ष को समाप्त करना, क्षेत्र में स्थिरता लाना और युद्ध से तबाह इलाकों के पुनर्निर्माण को गति देना है। भारत को इस मिशन में एक प्रभावशाली भूमिका देने की बात कही गई है, जिससे यह साफ है कि वॉशिंगटन नई वैश्विक व्यवस्था में नई दिल्ली को निर्णायक भागीदार मान रहा है।
हालांकि इस न्योते को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगा, क्या प्रधानमंत्री मोदी इस बोर्ड का हिस्सा बनेंगे और इस पहल पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नाराजगी क्यों सामने आई है।
क्या है Board of Peace
Board of Peace को अमेरिका समर्थित उस शांति योजना का दूसरा बड़ा चरण माना जा रहा है, जिसे ट्रंप प्रशासन पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने पेश कर चुका है। इस योजना को कई देशों का समर्थन भी मिल चुका है। अब इस योजना को जमीन पर लागू करने के लिए एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार किया जा रहा है, जिसे Board of Peace नाम दिया गया है।
इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य गाजा क्षेत्र में प्रभावी शासन व्यवस्था स्थापित करना, पुनर्निर्माण कार्यों को तेज करना और लंबे समय तक शांति सुनिश्चित करना है। इसके लिए सदस्य देशों से न केवल राजनीतिक समर्थन बल्कि आर्थिक योगदान की भी अपेक्षा की जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी को भेजा गया विशेष पत्र
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक औपचारिक पत्र लिखकर इस बोर्ड में भारत को शामिल होने का प्रस्ताव दिया है। पत्र में यह साफ किया गया है कि अमेरिका चाहता है कि भारत इस ऐतिहासिक पहल में एक अहम भूमिका निभाए।
अमेरिका के राजदूत सरियो गौर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप का संदेश प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंचाने का सम्मान मिला है। उन्होंने यह भी लिखा कि Board of Peace गाजा में स्थिरता, समृद्धि और प्रभावी प्रशासन की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकता है।
इस न्योते के साथ ही भारत की वैश्विक कूटनीतिक हैसियत पर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा शुरू हो गई है।
किन देशों को मिला न्योता

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के अलावा कम से कम चार अन्य देशों को भी Board of Peace में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। इनमें जॉर्डन, ग्रीस, साइपरस और पाकिस्तान शामिल हैं।
इसके अलावा जिन वैश्विक नेताओं को इस पहल में शामिल होने के लिए आमंत्रित किए जाने की पुष्टि हुई है, उनमें कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी और तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दोआन के नाम भी शामिल हैं। पाकिस्तान ने भी पुष्टि की है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को इस बोर्ड में शामिल होने का पत्र मिला है।
आर्थिक योगदान की शर्त
Board of Peace के प्रस्तावित चार्टर से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इस बोर्ड की अस्थायी सदस्यता के लिए देशों को एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देना होगा। हालांकि तीन साल के कार्यकाल के लिए किसी प्रकार की अनिवार्य आर्थिक शर्त तय नहीं की गई है।
इस पहल के जरिए जुटाई जाने वाली रकम का इस्तेमाल गाजा में बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण, नागरिक सुविधाओं की बहाली और प्रशासनिक सुधारों में किया जाएगा।
गाजा में पुनर्निर्माण की बड़ी योजना
अमेरिका का मानना है कि केवल संघर्षविराम से गाजा में स्थायी शांति संभव नहीं है। इसके लिए आर्थिक स्थिरता, रोजगार और प्रभावी शासन व्यवस्था जरूरी है। Board of Peace के जरिए इसी दिशा में काम किया जाएगा।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह बोर्ड स्थानीय प्रशासन को मजबूत करने, मानवीय सहायता के वितरण और सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
नेतन्याहू की नाराजगी
इस पूरी पहल के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की प्रतिक्रिया ने सबका ध्यान खींचा है। नेतन्याहू ने गाजा को लेकर बनाए गए इस पैनल पर आपत्ति जताई है।
उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि Board of Peace की संरचना इजरायल से परामर्श किए बिना तय की गई है, जो इजरायल की नीति के विपरीत है। इसी वजह से नेतन्याहू ने अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार की आपात बैठक बुलाई है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रस्ताव
भारत लंबे समय से मिडिल ईस्ट में संतुलित नीति अपनाता रहा है। एक तरफ भारत के इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ फिलिस्तीन के साथ भी भारत का ऐतिहासिक समर्थन रहा है।
Board of Peace में भारत की संभावित भागीदारी से नई दिल्ली को क्षेत्रीय शांति प्रक्रिया में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने का मौका मिल सकता है। इससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है।










