सोनिया गांधी की वोटर लिस्ट में एंट्री पर मदन राठौड़ का हमला, SIR को बताया ‘शुद्धिकरण’

राजस्थान BJP नेता मदन राठौड़ ने सोनिया गांधी की नागरिकता और पुराने मतदाता रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए। उन्होने SIR को मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया बताया।

राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने सोनिया गांधी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि नागरिकता से पहले उनका नाम मतदाता सूची में था। हालांकि, यह मामला अभी आरोप और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।

जयपुर: राजस्थान भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कांग्रेस और विपक्ष के उस विरोध पर निशाना साधा है, जो चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रहा है। मंगलवार को भाजपा मुख्यालय में उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उनका नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले ही मतदाता सूची में शामिल हो गया था।

राठौड़ ने कहा कि अगर उस समय भी SIR जैसी मतदाता सूची की गहन जांच की प्रक्रिया लागू होती, तो सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में नहीं रह पाता। उन्होंने इसी संदर्भ में इसे “वोट चोरी” बताया और कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों में मौजूद ऐसे मामलों का “शुद्धिकरण” करना है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सोनिया गांधी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ा मामला आरोपों और न्यायिक कार्यवाही का विषय है। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायत में दावा किया गया है कि उनका नाम 1980 की नई दिल्ली मतदाता सूची में था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। सितंबर 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने इस शिकायत को आगे की सुनवाई के लिए बहाल किया था।

मदन राठौड़ ने क्या कहा?

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने विपक्ष के SIR विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मतदाता सूची की जांच को लेकर आपत्ति करने के बजाय राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल पात्र नागरिकों के नाम ही मतदाता सूची में रहें।

राठौड़ ने सोनिया गांधी के मामले का उदाहरण देते हुए दावा किया कि उनका नाम नागरिकता मिलने से पहले मतदाता सूची में दर्ज था। उनके अनुसार, यदि उस समय SIR जैसी प्रक्रिया होती, तो ऐसा नाम मतदाता सूची में नहीं रह सकता था।

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष SIR को लेकर जनता के बीच गलत धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है। भाजपा नेता ने यह भी कहा कि मतदाता सूची की समीक्षा का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना होना चाहिए।

उनका बयान ऐसे समय आया है जब भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है और विपक्ष चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।

सोनिया गांधी के मतदाता रिकॉर्ड को लेकर क्या है विवाद?

सोनिया गांधी के मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित विवाद नया नहीं है। 2025 में एक याचिका के जरिए दिल्ली की अदालत में आरोप लगाया गया था कि उनका नाम 1980 की New Delhi constituency electoral roll में दर्ज था, जबकि भारतीय नागरिकता उन्हें 1983 में मिली।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि किसी गैर-भारतीय नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। शिकायत में यह भी कहा गया कि उनका नाम 1982 में मतदाता सूची से हटाया गया और बाद में 1983 में फिर दिखाई दिया।

भाजपा ने भी इस पुराने रिकॉर्ड को लेकर कांग्रेस पर राजनीतिक हमला किया था। भाजपा नेता अमित मालवीय ने 2025 में दावा किया था कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जबकि उन्होंने बाद में भारतीय नागरिकता हासिल की।

लेकिन इन आरोपों को अदालत द्वारा सोनिया गांधी की ओर से जानबूझकर किए गए मतदाता अपराध के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। सितंबर 2025 में एक मजिस्ट्रेट अदालत ने FIR दर्ज करने की मांग वाली शिकायत खारिज कर दी थी। इसके बाद सितंबर 2026 में राउज एवेन्यू कोर्ट ने उस आदेश को पलटते हुए शिकायत पर दोबारा विचार करने का रास्ता खोला।

2026 में फिर क्यों उठा मामला?

सितंबर 2026 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए पहले के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी कमियां थीं और मामले पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।

इसके बाद संबंधित मजिस्ट्रेट को मामले पर दोबारा सुनवाई करने और पुलिस से स्थिति रिपोर्ट मंगाने का निर्देश दिया गया। इससे यह पुराना विवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस में आ गया।

हालांकि, अदालत का यह आदेश सोनिया गांधी को दोषी ठहराने वाला फैसला नहीं है। यह केवल शिकायत की न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से संबंधित है। इसलिए राजनीतिक बयानों में लगाए जा रहे आरोपों और अदालत द्वारा स्थापित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

SIR को लेकर विपक्ष और भाजपा आमने-सामने

Special Intensive Revision (SIR) मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, पात्र मतदाताओं को शामिल करना और अपात्र या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना है।

लेकिन विपक्षी दलों ने कई मौकों पर SIR को लेकर चिंता जताई है। उनका आरोप रहा है कि व्यापक दस्तावेजी जांच के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से हटने का जोखिम पैदा हो सकता है।

दूसरी ओर, भाजपा और सरकार का तर्क है कि मतदाता सूची में केवल पात्र नागरिकों के नाम होने चाहिए और चुनाव की विश्वसनीयता के लिए समय-समय पर इसका पुनरीक्षण जरूरी है।

मदन राठौड़ का ताजा बयान इसी राजनीतिक टकराव का हिस्सा है। उन्होंने सोनिया गांधी से जुड़े पुराने मतदाता रिकॉर्ड को उदाहरण बनाकर कहा कि SIR जैसी प्रक्रिया मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है।

‘कौन मतदाता होना चाहिए’ पर राठौड़ का तर्क

राठौड़ ने अपने बयान में मतदाता पात्रता को लेकर एक व्यापक राजनीतिक और वैचारिक तर्क भी रखा। उन्होंने कहा कि देश में वोट देने का अधिकार उन्हीं लोगों को होना चाहिए जो कानूनी रूप से भारतीय नागरिक और मतदाता के रूप में पात्र हैं।

उन्होंने कहा कि देश की मतदाता सूची में ऐसे लोगों का नाम नहीं होना चाहिए जो केवल आर्थिक या अन्य लाभ लेने के लिए भारत में आए हों और जिनके पास मतदान का कानूनी अधिकार नहीं है।

भाजपा नेता ने “देश की जड़ों” और “वंशज” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मताधिकार को देश से जुड़े लोगों के अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए।

हालांकि, भारतीय चुनाव कानून में मताधिकार की पात्रता कानूनी नागरिकता और निर्धारित चुनावी मानदंडों पर आधारित है। केवल किसी व्यक्ति का परिवार कई पीढ़ियों से भारत में रहा हो, यह अपने आप में मतदाता पात्रता का अलग कानूनी मानदंड नहीं है।

मतदाता बनने के लिए नागरिकता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के Representation of the People Act, 1950 के तहत गैर-भारतीय नागरिक को मतदाता सूची में पंजीकृत किए जाने से अयोग्य माना जाता है। इसी कानूनी प्रावधान को आधार बनाकर सोनिया गांधी से संबंधित शिकायत में भी सवाल उठाए गए थे।

इसीलिए पुराने मतदाता रिकॉर्ड में नागरिकता की तारीख और मतदाता पंजीकरण की तारीख के बीच अंतर का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना है।

हालांकि, किसी रिकॉर्ड में कथित विसंगति मिलने और किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर कानून तोड़ने के बीच कानूनी अंतर होता है। यह निर्धारित करने के लिए दस्तावेज, पंजीकरण प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई और अन्य साक्ष्यों की जांच जरूरी होती है।

‘वोट चोरी’ के आरोप पर क्या समझना जरूरी है?

मदन राठौड़ ने सोनिया गांधी से जुड़े पुराने मतदाता रिकॉर्ड को “वोट चोरी” से जोड़ा है। यह भाजपा नेता का राजनीतिक आरोप है, न कि अदालत द्वारा स्थापित निष्कर्ष।

मतदाता सूची में कथित गलत प्रविष्टि, फर्जी दस्तावेज या चुनावी धोखाधड़ी जैसे आरोपों को साबित करने के लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। मौजूदा मामले में अदालत ने शिकायत को आगे सुनने की अनुमति दी है, लेकिन अभी कोई अंतिम दोषसिद्धि नहीं हुई है।

इसलिए इस पूरे विवाद का वास्तविक कानूनी निष्कर्ष आगे की सुनवाई और जांच के बाद ही सामने आएगा।

SIR पर बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव

सोनिया गांधी का मुद्दा ऐसे समय उठा है जब भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद जारी हैं।

भाजपा SIR को चुनावी प्रक्रिया को साफ और अधिक विश्वसनीय बनाने का उपाय बता रही है। वहीं विपक्ष इसे मतदाताओं के अधिकारों और संभावित नाम कटने के जोखिम से जोड़कर सवाल उठा रहा है।

मदन राठौड़ का बयान इस बहस को राजस्थान की राजनीति से आगे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से भी जोड़ता है। सोनिया गांधी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड का उल्लेख कर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि मतदाता सूची की जांच को केवल राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी शुचिता के सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।

आगे SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के नियम और अदालतों में चल रहे मामलों के परिणाम यह तय करेंगे कि मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है।

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