मॉस्को में कम्युनिस्ट पार्टी की रैली के बाद करीब 60 लोग हिरासत में, ‘निष्पक्ष चुनाव’ के लगे नारे

मॉस्को मे रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की रैली के दौरान पुलिस ने करीब 60 लोगों को हिरासत में लिया। प्रदर्शनकारियों ने निष्पक्ष चुनाव और कैदियों की आजादी के नारे लगाए।

रूस की राजधानी मॉस्को में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की रैली के दौरान पुलिस ने करीब 60 लोगों को हिरासत में लिया। पार्टी के अनुसार, कार्रवाई प्रदर्शन खत्म होने के समय हुई। रैली में निष्पक्ष चुनाव और राजनीतिक कैदियों की आजादी जैसे नारे लगाए गए।

मॉस्को: रूस की राजधानी मॉस्को में रविवार को रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से आयोजित रैली के दौरान पुलिस ने करीब 60 लोगों को हिरासत में लिया। पार्टी ने खुद इसकी जानकारी देते हुए कहा कि प्रदर्शन समाप्त होने के समय ये हिरासत हुईं। पार्टी के मुताबिक, हिरासत में लिए गए लोगों में अधिकतर युवा शामिल हैं और मॉस्को स्थित पार्टी की शाखा उनकी रिहाई के लिए काम कर रही है।

यह रैली वर्ष 1993 के संसदीय विद्रोह को कुचलने की घटना की वर्षगांठ के मौके पर आयोजित की गई थी। प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रतिभागियों ने राजनीतिक कैदियों की आजादी, निष्पक्ष चुनाव और सरकार के खिलाफ नारे लगाए।

रैली के दौरान लगाए गए नारे

रूसी समाचार चैनल Ostorozhno Novosti के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने रैली के दौरान कई राजनीतिक नारे लगाए। इनमें “राजनीतिक कैदियों को आजादी”, “निष्पक्ष चुनाव के लिए” और “जारशाही खत्म करो” जैसे नारे शामिल थे।

रैली के दौरान लगे इन नारों को रूस में मौजूदा राजनीतिक माहौल के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, रूसी कम्युनिस्ट पार्टी स्वयं क्रेमलिन के प्रति अपेक्षाकृत सहयोगी रुख रखने वाली प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल है।

पार्टी ने कहा कि हिरासत की कार्रवाई रैली खत्म होने के समय हुई। उसने हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या करीब 60 बताई है।

1993 की हिंसा की वर्षगांठ पर आयोजित हुई रैली

रैली का आयोजन अक्टूबर 1993 में मॉस्को में हुए उस राजनीतिक टकराव की वर्षगांठ के मौके पर किया गया था, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और उनके विरोधी सांसदों के बीच लंबे समय से चला आ रहा संघर्ष हिंसक रूप ले चुका था।

उस समय रूस आर्थिक और राजनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रहा था। येल्तसिन सरकार बाजार आधारित आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा रही थी, जबकि कई कट्टरपंथी सांसद इन सुधारों का विरोध कर रहे थे। यह टकराव कई महीनों तक चलता रहा और अंततः अक्टूबर 1993 में हिंसक संघर्ष में बदल गया।

संसद भंग करने के बाद बढ़ा टकराव

1993 के संकट के दौरान राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने संसद को भंग करने का आदेश दिया था। इसके बाद उनके विरोध में खड़े सांसदों के समर्थकों ने सरकारी संस्थानों पर कब्जे की कोशिश की।

प्रदर्शनकारियों ने राज्य टेलीविजन प्रसारण केंद्र पर कब्जा करने का प्रयास किया। इसके बाद येल्तसिन ने सेना को कार्रवाई का आदेश दिया।

रूसी सुरक्षा बलों ने संसद भवन पर टैंकों से गोलाबारी की। इस कार्रवाई के बाद हिंसा समाप्त हुई और येल्तसिन सरकार ने राजनीतिक संकट पर नियंत्रण हासिल किया।

1993 की हिंसा में कितने लोग मारे गए?

उस समय रूसी अधिकारियों ने बताया था कि अक्टूबर 1993 की हिंसा में 123 लोगों की मौत हुई थी। हालांकि, अनौपचारिक अनुमानों में मृतकों की संख्या इससे काफी अधिक बताई गई थी और कुछ आकलनों में मृतकों की संख्या सैकड़ों में बताई गई।

1993 का संकट आधुनिक रूस के राजनीतिक इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक माना जाता है। इसने राष्ट्रपति और संसद के बीच सत्ता के संघर्ष को निर्णायक रूप से राष्ट्रपति के पक्ष में बदल दिया। बाद में रूस में नई संवैधानिक व्यवस्था लागू हुई, जिसने राष्ट्रपति के अधिकारों को मजबूत किया।

रैली ऐसे समय हुई जब रूस में तनाव बढ़ा है

मॉस्को में यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है, जब यूक्रेन के साथ जारी युद्ध के बीच रूस के भीतर भी कई तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं।

हाल के समय में यूक्रेन की ओर से रूस के अंदरूनी इलाकों तक ड्रोन हमलों में तेजी आने की खबरें सामने आई हैं। इन हमलों में तेल रिफाइनरियों और गोदामों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया है।

इन हमलों के कारण रूस के कुछ क्षेत्रों में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित होने और दैनिक जीवन में व्यवधान आने की खबरें सामने आई हैं। मॉस्को भी ड्रोन हमलों और उनके कारण उत्पन्न व्यवधानों से अछूता नहीं रहा है।

यूक्रेन युद्ध के बीच बढ़ती मुश्किलें

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध लंबे समय से जारी है। युद्ध के शुरुआती दौर में मुख्य लड़ाई यूक्रेन के क्षेत्र में केंद्रित थी, लेकिन समय के साथ दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के क्षेत्र में हमले बढ़े हैं।

यूक्रेन ने रूस के भीतर सैन्य और ऊर्जा से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया है। रूस का कहना है कि ऐसे हमले उसकी सुरक्षा और नागरिक बुनियादी ढांचे के लिए खतरा हैं।

दूसरी ओर, यूक्रेन इन हमलों को रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर करने की अपनी रणनीति का हिस्सा बताता है।

रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का राजनीतिक इतिहास

रूस की कम्युनिस्ट पार्टी देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक है और 1990 के दशक से संसद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

पार्टी का नेतृत्व पिछले तीन दशकों से अधिक समय से 82 वर्षीय गेन्नादी ज्युगानोव कर रहे हैं। ज्युगानोव सोवियत काल के पूर्व अधिकारी रहे हैं।

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की कम्युनिस्ट पार्टी ने देश की राजनीति में सोवियत विरासत और समाजवादी विचारधारा को बनाए रखने की कोशिश की है।

पुतिन के शासन में पार्टी का रुख

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लंबे शासनकाल के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना जरूर की है, लेकिन राष्ट्रपति पुतिन की व्यक्तिगत रूप से आलोचना करने से आम तौर पर बचती रही है। पार्टी ने यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान का भी लगातार समर्थन किया है। इस वजह से उसे क्रेमलिन के प्रति सहयोगी विपक्षी दल के रूप में देखा जाता है।

इसके बावजूद पार्टी के कुछ कार्यक्रमों और प्रदर्शनों में सरकार या राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े नारों का इस्तेमाल सामने आता रहा है। मॉस्को की हालिया रैली में भी ऐसे नारे लगाए गए, जिनमें निष्पक्ष चुनाव और राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग शामिल थी।

हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की कोशिश

रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा कि मॉस्को शाखा हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई के लिए प्रयास कर रही है। पार्टी के मुताबिक, पुलिस की कार्रवाई रैली के समाप्त होने के दौरान हुई।

हिरासत में लिए गए लोगों में अधिकतर युवा बताए गए हैं। हालांकि, सभी हिरासत में लिए गए लोगों की पहचान और उन पर लगाए गए संभावित आरोपों की विस्तृत जानकारी तत्काल उपलब्ध नहीं हुई है।

रूसी अधिकारियों की ओर से हिरासत की पूरी वजह और कार्रवाई के संबंध में विस्तृत आधिकारिक बयान भी सामने नहीं आया है।

रूस में राजनीतिक प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई

रूस में राजनीतिक प्रदर्शनों और सार्वजनिक सभाओं पर कानून के तहत कई तरह की पाबंदियां लागू हैं। बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की हिरासत के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं।

मॉस्को में हुई इस रैली में पुलिस की कार्रवाई के कारण यह आयोजन एक बार फिर रूस में राजनीतिक अभिव्यक्ति, सार्वजनिक प्रदर्शन और चुनावी प्रक्रिया को लेकर बहस के केंद्र में आ गया है। हालांकि, रैली में लगाए गए नारों और हिरासत के बीच सीधा कानूनी संबंध क्या था, यह रूसी अधिकारियों की विस्तृत जानकारी के बाद ही स्पष्ट होगा।

1993 से आज तक बदला रूस का राजनीतिक परिदृश्य

1993 के संकट के बाद रूस में राष्ट्रपति पद की शक्ति काफी मजबूत हुई। इसके बाद देश की राजनीतिक व्यवस्था में कई बड़े बदलाव हुए।

व्लादिमीर पुतिन के लंबे शासनकाल में रूस की राजनीतिक व्यवस्था और अधिक केंद्रीकृत हुई है। विपक्षी गतिविधियों, सार्वजनिक प्रदर्शनों और स्वतंत्र राजनीतिक आंदोलनों पर भी कई तरह के प्रतिबंध और कानूनी दबाव देखने को मिले हैं, ऐसे माहौल में 1993 के संसदीय विद्रोह की वर्षगांठ पर आयोजित रैली और उसमें लगे राजनीतिक नारे विशेष महत्व रखते हैं।

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