नेपाल में Gen-Z क्यों है नाराज, आंदोलन के बाद भी क्यों नहीं बदले हालात

नेपाल में Gen-Z क्यों है नाराज, आंदोलन के बाद भी क्यों नहीं बदले हालात

नेपाल में राजनीतिक आंदोलन के बाद भी बदलाव न दिखने से Gen-Z में नाराजगी बढ़ रही है। अंतरिम सरकार से भ्रष्टाचार पर कार्रवाई और जवाबदेही की उम्मीद थी, लेकिन निराशा ने युवाओं के गुस्से को और तेज कर दिया है।

Nepal: नेपाल में हालिया राजनीतिक बदलाव के बाद जिस उम्मीद के साथ युवाओं ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया था, वही युवा वर्ग अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। खासकर Gen-Z कार्यकर्ताओं में यह भावना तेजी से फैल रही है कि जिन सपनों को लेकर उन्होंने अपनी जान और भविष्य दांव पर लगाया, वे पूरे नहीं हो पाए। अंतरिम सरकार के गठन और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की नियुक्ति के बावजूद हालात बदले नहीं हैं।

आंदोलन से विदेश तक का सपना टूटा

22 वर्षीय मुकेश अवस्थी की कहानी आज नेपाल के युवा आंदोलन की सबसे दर्दनाक मिसाल बन चुकी है। सितंबर के एक दिन वह ऑस्ट्रेलिया में Civil Engineering की पढ़ाई के लिए रवाना होने वाले थे। उनका सपना था कि पढ़ाई पूरी कर बेहतर भविष्य बनाएंगे। लेकिन उसी वक्त नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ Gen-Z के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो गया।

मुकेश ने देश के लिए आवाज उठाने का फैसला किया। वह प्रदर्शन में शामिल हुए और उसी दौरान सुरक्षा बलों की गोली लगने से उनका पैर गंभीर रूप से घायल हो गया। काठमांडू के National Trauma Center में डॉक्टरों को उनकी टांग काटनी पड़ी।

अवस्थी आज कहते हैं कि इतने लोगों के बलिदान के बाद जो थोड़ा-बहुत हासिल हुआ है, उसके लिए उन्होंने बहुत कुछ खो दिया। उन्हें अब इस फैसले पर अफसोस होता है।

सितंबर के हिंसक प्रदर्शन और भारी कीमत

काठमांडू में 8 सितंबर से शुरू हुए प्रदर्शन शुरू में शांतिपूर्ण थे, लेकिन बाद में हालात हिंसक हो गए। इन प्रदर्शनों में 76 लोगों की मौत हुई और 2,300 से ज्यादा लोग घायल हुए।

Gen-Z कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में हुए इन आंदोलनों ने पूरे देश को झकझोर दिया। युवाओं की मांग साफ थी—भ्रष्टाचार का अंत, जवाबदेही और राजनीतिक सुधार। सरकार पर दबाव बढ़ा और आखिरकार 12 सितंबर को बड़ा फैसला लिया गया।

सुशीला कार्की बनीं पहली महिला प्रधानमंत्री

प्रदर्शनों के दबाव के बाद नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक कदम उठाया गया। उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।

इस फैसले को युवाओं की जीत माना गया। सुशीला कार्की की छवि एक ईमानदार और सख्त जज की रही है। उन्होंने मार्च में नए चुनाव कराने का वादा किया और कहा कि अंतरिम सरकार का उद्देश्य देश को स्थिरता की ओर ले जाना है। उस वक्त Gen-Z को लगा कि उनका संघर्ष रंग ला रहा है।

उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी अंतरिम सरकार

लेकिन कुछ ही महीनों में यह उम्मीद टूटने लगी। जिन युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार बदलने में भूमिका निभाई थी, वही अब अंतरिम सरकार और सुशीला कार्की की खुलकर आलोचना कर रहे हैं।

मुकेश अवस्थी जैसे कई युवा कहते हैं कि नई सरकार से कोई ठोस उपलब्धि नहीं मिली। भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिन सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। युवाओं का कहना है कि उन्हें न्याय और जवाबदेही की उम्मीद थी, लेकिन सरकार उस दिशा में आगे नहीं बढ़ी।

भ्रष्टाचार पर कार्रवाई क्यों नहीं दिखी

सरकार की Anti-Corruption Agency ने अब तक केवल एक बड़ा भ्रष्टाचार मामला दर्ज किया है, जिसमें किसी प्रमुख राजनीतिक चेहरे का नाम नहीं है। इसके उलट, जिन नेताओं पर प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, वे आगामी चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं।

सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर है कि सितंबर में जब प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं, तब सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं हुआ। Gen-Z को लगता है कि व्यवस्था ने एक बार फिर ताकतवर लोगों को बचा लिया।

Gen-Z की सबसे बड़ी शिकायत

युवा कार्यकर्ताओं की शिकायत सिर्फ भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि सरकार ने आंदोलन की मूल भावना को नजरअंदाज कर दिया।

एक प्रदर्शनकारी कहते हैं कि हमने नई सरकार बनाई, लेकिन वही पुराने चेहरे और वही पुरानी राजनीति वापस आ गई। जिन बदलावों के लिए हमने खून बहाया, वे कागजों में ही रह गए।

अंतरिम सरकार के गठन के समय राष्ट्रपति ने साफ कहा था कि इसका मुख्य उद्देश्य संसद के चुनाव कराना है। नेपाल के संविधान में अंतरिम सरकार बनाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। संविधान में केवल यह लिखा है कि राष्ट्रपति का मुख्य कर्तव्य संविधान का पालन करना और उसकी रक्षा करना है।

मार्च में चुनाव होंगे या नहीं

सरकार ने मार्च में चुनाव कराने का वादा किया है, लेकिन इसे लेकर अब भी संदेह बना हुआ है। राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक तैयारियों की कमी के चलते कई विशेषज्ञ मानते हैं कि समय पर चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि चुनाव के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं दिखता। युवाओं का मानना है कि अगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जल्द आगे नहीं बढ़ाया गया, तो असंतोष और बढ़ेगा।

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