पटना। बिहार की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी हलचल तेज होती दिख रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भविष्य को लेकर जारी अटकलों के बीच सरकार के भीतर के समीकरण भी चर्चा में आ गए हैं। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि अगर नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से दूरी बनाते हैं या मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं, तो उनके बेहद करीबी मंत्री बिजेंद्र यादव भी मंत्री पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, बिजेंद्र यादव लंबे समय से नीतीश कुमार के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं। सरकार के कई महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका अहम रही है। यही वजह है कि यह माना जा रहा है कि उनका राजनीतिक रुख काफी हद तक नीतीश कुमार के फैसले पर निर्भर करेगा। अगर नेतृत्व में बदलाव होता है, तो वे भी अपनी भूमिका पर पुनर्विचार कर सकते हैं।
इधर, राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री अशोक चौधरी को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। कहा जा रहा है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों में उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रह सकता। अभी तक उन्हें मुख्यमंत्री के करीबी नेताओं में माना जाता रहा है और सरकार के कई अहम फैसलों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन अगर सत्ता का संतुलन बदलता है, तो मंत्रिमंडल में उनकी स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है। कई बड़े नेता आने वाले समय में अपनी राजनीतिक रणनीति को लेकर नए फैसले ले सकते हैं। खासकर उन नेताओं की स्थिति पर ज्यादा असर पड़ सकता है, जो अब तक मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद माने जाते रहे हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री की तथाकथित “किचन कैबिनेट” को लेकर हो रही है। किचन कैबिनेट उस छोटे लेकिन प्रभावशाली समूह को कहा जाता है जिसमें कुछ चुनिंदा मंत्री और सलाहकार शामिल होते हैं, जो सरकार के अहम फैसलों में मुख्यमंत्री को सीधे सलाह देते हैं। बिहार सरकार में भी ऐसे कई चेहरे हैं जो इस अनौपचारिक समूह का हिस्सा माने जाते हैं।
अगर नेतृत्व में बदलाव होता है, तो इस किचन कैबिनेट की ताकत और प्रभाव भी बदल सकता है। कई नेताओं की भूमिका सीमित हो सकती है, जबकि कुछ नए चेहरे भी उभर सकते हैं।
फिलहाल बिहार की सियासत में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ मंत्रिमंडल के भीतर भी कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। सबकी नजरें अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि उनके फैसले से ही बिहार की राजनीति की दिशा और सत्ता के समीकरण तय होने वाले हैं।











