जब हमारे सामने कोई बहुत बड़ी समस्या या संकट आता है, तो अक्सर हम यह सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं कि 'मेरे अकेले के करने से क्या होगा?' या 'मैं तो बहुत छोटा हूँ, मैं क्या बदलाव ला सकता हूँ?' यह कहानी एक ऐसी नन्ही चिड़िया की है, जिसका साहस हमें सिखाता है कि जब बात कर्तव्य और जिम्मेदारी की हो, तो योगदान का आकार नहीं, बल्कि योगदान देने की नीयत मायने रखती है।
कहानी
एक बहुत घना और विशाल जंगल था, जहाँ सभी जानवर-शेर, हाथी, भालू, हिरण और तरह-तरह के पक्षी-मजे से रहते थे। जंगल में एक नन्ही सी 'गौरैया' (चिड़िया) का भी घोंसला था, जिसमें वह अपने परिवार के साथ खुश थी।
एक बार गर्मी के मौसम में, भयानक सूखा पड़ा। तेज हवाओं के कारण सूखी लकड़ियों में रगड़ हुई और जंगल में भीषण आग लग गई। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। लपटें आसमान छूने लगीं और चारों तरफ धुआँ ही धुआँ हो गया।
जंगल में हाहाकार मच गया। सभी जानवर अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। बड़े-बड़े शक्तिशाली हाथी चिंघाड़ते हुए भाग रहे थे, जंगल का राजा शेर भी अपनी गुफा छोड़कर सुरक्षित स्थान की तलाश में दौड़ रहा था। हर कोई बस अपनी जान बचाना चाहता था।
उसी जंगल की वह नन्ही गौरैया भी यह सब देख रही थी। उसका घर, उसका प्यारा जंगल उसकी आँखों के सामने जल रहा था। उसे बहुत दुःख हुआ। उसने सोचा कि वह हाथ पर हाथ रखकर अपना घर जलते हुए नहीं देख सकती।
चिड़िया ने तुरंत उड़ान भरी और पास की नदी पर पहुँची। उसने अपनी छोटी सी चोंच में पानी भरा और तेजी से उड़ती हुई आग वाली जगह पर आई। उसने वह पानी की कुछ बूंदें आग की लपटों पर गिरा दीं।
वह फिर वापस नदी की तरफ उड़ी, चोंच में पानी भरा और लाकर आग पर डाला। वह बार-बार ऐसा करने लगी। उसका शरीर छोटा था, उसकी उड़ान थका देने वाली थी और आग की तपिश उसे झुलसा रही थी, लेकिन वह रुकी नहीं।
जंगल के एक सुरक्षित पेड़ की ऊंची डाल पर बैठा एक 'कौवा' यह सब देख रहा था। उसे चिड़िया की यह हरकत बड़ी अजीब और हास्यास्पद लगी। जब चिड़िया पानी लेकर उसके पास से गुजरी, तो कौवे ने उसे रोका और उसका मजाक उड़ाते हुए कहा, 'अरी ओ पगली चिड़िया! तू यह क्या मूर्खता कर रही है? जरा नीचे देख, यह आग कितनी भयानक है। क्या तुझे सच में लगता है कि तेरी इस नन्ही सी चोंच की दो बूंद पानी से यह महाप्रलय रुक जाएगी? क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रही है? बाकी जानवरों की तरह तू भी भाग जा।'
चिड़िया एक पल के लिए रुकी। उसकी सांस फूल रही थी और पंख धुएं से काले हो गए थे। उसने बड़ी शालीनता और दृढ़ता से कौवे को जवाब दिया, 'भाई कौवे, मुझे भी पता है कि मेरी चोंच के पानी से यह भयानक आग नहीं बुझेगी। लेकिन यह जंगल मेरा घर है, इसने मुझे आश्रय दिया है।'
चिड़िया ने आगे कहा, 'जब इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा, और इस आग का जिक्र होगा, तो मेरा नाम उन लोगों में नहीं लिखा जाएगा जो आग देखकर भाग खड़े हुए थे या दूर बैठकर तमाशा देख रहे थे और मजाक उड़ा रहे थे। मेरा नाम उन लोगों में लिखा जाएगा, जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक इस आग को बुझाने की कोशिश की थी। मैं बस अपना धर्म निभा रही हूँ और अपना योगदान दे रही हूँ।'
कौवा यह सुनकर सन्न रह गया। उसे अपनी सोच पर बहुत शर्म आई। उस नन्ही चिड़िया के जज्बे ने उसे बहुत बड़ी सीख दी थी।
सीख
जीवन में जब भी कोई संकट आए, तो यह मत सोचिए कि समस्या कितनी बड़ी है और आप कितने छोटे हैं। यह मत सोचिए कि 'मेरे अकेले के करने से क्या फर्क पड़ेगा।' बस यह देखिए कि उस स्थिति में आपकी जिम्मेदारी क्या है। आपका छोटा सा सकारात्मक प्रयास और योगदान भी बहुत मायने रखता है। इतिहास तमाशबीनों को नहीं, प्रयास करने वालों को याद रखता है।












