NSE आईपीओ पर कानूनी सस्पेंस, सेबी की मंजूरी को लेकर अदालत में घमासान

NSE IPO को लेकर फिर अनिश्चितता बढ़ी। दिल्ली उच्च न्यायालय मे याचिका से सेबी के एनओसी पर सवाल उठे, जिससे शेयर बाजार की बहुप्रतीक्षित लिस्टिंग पर संशय बना हुआ है।

NSE के आईपीओ पर संकट गहरा गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर याचिका से Securities and Exchange Board of India के अनापत्ति प्रमाणपत्र पर सवाल उठे हैं, जिससे भारत के सबसे बड़े शेयर बाजार की लिस्टिंग प्रक्रिया एक बार अनिश्चित हो गई है दोबारा।

IPO News: भारत के सबसे बड़े शेयर बाजार NSE (National Stock Exchange of India) के बहुप्रतीक्षित आईपीओ को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता गहराती दिख रही है। एनएसई की लिस्टिंग की प्रक्रिया उस समय नई बाधा में फंस गई, जब दिल्ली उच्च न्यायालय में सेबी द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल की गई। इस याचिका के कारण एनएसई के सार्वजनिक होने की राह एक बार फिर कठिन होती दिखाई दे रही है।

लगभग दस वर्षों से प्रतीक्षा में है एनएसई का सार्वजनिक निर्गम

एनएसई के सार्वजनिक निर्गम की चर्चा वर्ष 2016 से चल रही है। उस समय यह अनुमान लगाया गया था कि यह भारत के पूंजी बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ होगा। किंतु बीते वर्षों में नियामकीय जांच, आंतरिक विवाद और पुराने मामलों के कारण यह प्रक्रिया बार-बार स्थगित होती रही।

हाल के दिनों में जब यह संकेत मिला कि एनएसई को आईपीओ के लिए आगे बढ़ने की अनुमति मिल गई है, तब बाजार और निवेशकों के बीच उम्मीद जगी थी कि यह लंबा इंतजार अब समाप्त होने वाला है। परंतु अब न्यायालय में दाखिल नई याचिका ने फिर से स्थिति को असमंजस में डाल दिया है।

सेबी के अनापत्ति प्रमाणपत्र को दी गई चुनौती

एनएसई को आईपीओ के लिए आगे बढ़ने की अनुमति Securities and Exchange Board of India द्वारा 30 जनवरी को जारी किए गए अनापत्ति प्रमाणपत्र के माध्यम से दी गई थी। इसी प्रमाणपत्र को आधार बनाकर एनएसई ने अपनी लिस्टिंग की प्रक्रिया तेज करने की तैयारी शुरू की थी।

अब इस अनापत्ति प्रमाणपत्र को यह कहते हुए चुनौती दी गई है कि सेबी ने एनएसई के एक विवादित कदम की स्वतंत्र जांच किए बिना उसे मंजूरी दे दी। याचिका में कहा गया है कि यह मंजूरी कानून और नियमों की भावना के विपरीत है।

याचिकाकर्ता कौन है और उसने क्या मांग की है

यह याचिका नई दिल्ली निवासी केसी अग्रवाल द्वारा दाखिल की गई है। उनकी आयु 72 वर्ष है और वे पूर्व न्यायिक अधिकारी रह चुके हैं। साथ ही वे डेरिवेटिव कारोबार से भी जुड़े रहे हैं। केसी अग्रवाल ने 10 फरवरी को दिल्ली उच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की। उन्होंने मांग की है कि सेबी द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र को निरस्त किया जाए और एनएसई के कथित नियम उल्लंघन की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

कॉर्पोरेट एक्शन समायोजन ढांचा बना विवाद का केंद्र

याचिका का मुख्य आधार सेबी द्वारा निर्धारित कॉर्पोरेट एक्शन समायोजन ढांचा है। यह ढांचा बोनस निर्गम, शेयर विभाजन और विशेष लाभांश जैसे मामलों में डेरिवेटिव कारोबार को संतुलित बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इस ढांचे का मूल सिद्धांत यह है कि किसी भी कॉर्पोरेट कार्रवाई से पहले और बाद में डेरिवेटिव कारोबारियों की आर्थिक स्थिति समान बनी रहनी चाहिए। इसे मूल्य तटस्थता का सिद्धांत कहा जाता है।

एनएसई पर लगाए गए गंभीर आरोप

याचिकाकर्ता का आरोप है कि एनएसई ने इस समायोजन ढांचे का सही ढंग से पालन नहीं किया। नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में मूल्य और मात्रा दोनों में समायोजन किया जाना आवश्यक होता है। किंतु याचिका के अनुसार एनएसई ने केवल मूल्य में बदलाव किया और मात्रा में कोई समायोजन नहीं किया। इसके अतिरिक्त एनएसई ने डेरिवेटिव कारोबारियों के खातों से सीधे लाभांश के बराबर राशि काट ली।

लाभांश कटौती को बताया गया कानून के विरुद्ध

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रतिभूति अनुबंध विनियमन अधिनियम के अंतर्गत लाभांश केवल शेयरधारकों का अधिकार है। डेरिवेटिव कारोबारियों को न तो लाभांश मिलता है और न ही उनसे लाभांश के नाम पर धनराशि काटी जा सकती है।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने इस कटौती को अवैध और कानून के विरुद्ध बताया है। उनका कहना है कि यह कदम न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि निवेशकों के अधिकारों पर भी आघात करता है।

शिकायतों की अनदेखी का लगाया आरोप

केसी अग्रवाल ने यह भी कहा है कि उन्होंने इस मामले को लेकर एनएसई के समक्ष कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनकी शिकायतों को बिना किसी सुनवाई के बंद कर दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि सेबी ने भी इस मामले में कोई स्वतंत्र समीक्षा नहीं की और केवल एनएसई के स्पष्टीकरण के आधार पर उसके कदम को सही ठहरा दिया।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि डेरिवेटिव कारोबारियों से काटी गई राशि का विवरण जानने के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत कई आवेदन किए गए। किंतु इन सभी आवेदनों को अस्वीकार कर दिया गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे पूरे मामले में जानकारी का अभाव उत्पन्न हो गया। यहां तक कि जनवरी 2026 तक सेबी के अध्यक्ष को भेजे गए पत्रों और ईमेल का भी कोई उत्तर नहीं मिला।

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