मकर संक्रांति के मौके पर लालू परिवार की गतिविधियां इस बार भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहीं, लेकिन स्वर पूरी तरह खामोश रहा। एक ओर Tejashwi Yadav का बैंगन दान चर्चा में रहा, तो दूसरी ओर Tej Pratap Yadav ने दही-चूड़ा दरबार सजा कर अलग संदेश देने की कोशिश की। इन सांस्कृतिक आयोजनों के बीच Lalu Prasad Yadav परिवार की राजनीतिक भाषा संयमित और प्रतीकात्मक नजर आई।
बैंगन दान: संदेश बिना बयान
तेजस्वी यादव ने मकर संक्रांति पर परंपरागत रीति-रिवाजों के तहत बैंगन दान किया। सार्वजनिक मंच से किसी तरह का राजनीतिक बयान नहीं दिया गया, लेकिन समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे सांकेतिक कदम के रूप में देखा। माना जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में तेजस्वी ने शोर से दूर रहकर संस्कृति और परंपरा के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
दही-चूड़ा दरबार: जनसंपर्क का पुराना तरीका
वहीं तेज प्रताप यादव ने अपने अंदाज में दही-चूड़ा दरबार लगाकर समर्थकों और आगंतुकों से मुलाकात की। यह आयोजन पूरी तरह पारंपरिक रहा, जहां राजनीति से ज्यादा लोक-संस्कृति और मिलन पर जोर दिखा। हालांकि, बिहार की राजनीति में ऐसे आयोजनों को हमेशा संभावित संदेशों से जोड़कर देखा जाता है।
खामोशी में छुपा संतुलन
लालू परिवार की ओर से किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे पर बयान न आना भी अपने आप में अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह सोची-समझी रणनीति हो सकती है—जहां त्योहार के बहाने जनता से जुड़ाव बना रहे, लेकिन सियासी बयानबाज़ी से दूरी रखी जाए।
राजनीतिक हलकों में चर्चा
पटना के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तैरता रहा कि क्या यह खामोशी आने वाले समय के लिए रणनीतिक विराम है। विपक्ष इसे प्रतीकात्मक राजनीति बता रहा है, जबकि समर्थकों का मानना है कि यह जनता की परंपराओं के साथ खड़े रहने का संदेश है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति पर लालू परिवार ने शोरगुल से दूर रहकर संकेतों की राजनीति की। बैंगन दान और दही-चूड़ा दरबार के जरिए सांस्कृतिक जुड़ाव दिखा, जबकि बड़े राजनीतिक बयान न देकर संतुलन साधा गया। बिहार की राजनीति में यह खामोशी भी उतनी ही बोलती नजर आई, जितना कभी-कभी खुले मंच से दिया गया बयान।










