प्रतिभूति बाजार संहिता 2025 का उद्देश्य भारतीय पूंजी बाजार को सरल और पारदर्शी बनाना है। यह तीन पुराने कानूनों को एकीकृत कर निवेशक सुरक्षा मजबूत करने, नियमन स्पष्ट करने और सेबी की संरचना में सुधार लाने पर केंद्रित है।
Securities Market Code 2025: प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक 2025 यानी Securities Market Code 2025 भारतीय पूंजी बाजार को सरल, एकीकृत और ज्यादा पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार ने इस विधेयक को हाल ही में पेश किया है और फिलहाल इसे संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के पास समीक्षा के लिए भेजा गया है। इस संहिता का मकसद दशकों पुराने और बिखरे हुए कानूनों को एक फ्रेमवर्क में लाना है ताकि निवेशक, बाजार मध्यस्थ और नियामक सभी के लिए नियमों को समझना और लागू करना आसान हो सके।
तीन पुराने कानूनों का होगा एकीकरण
एसएमसी 2025 तीन अहम कानूनों की जगह लेगा। इनमें प्रतिभूति अनुबंध विनियमन अधिनियम 1956, सेबी अधिनियम 1992 और डिपॉजिटरी अधिनियम 1996 शामिल हैं। अब तक ये तीनों कानून अलग-अलग पहलुओं को नियंत्रित करते थे। पहला स्टॉक एक्सचेंज और ट्रेडिंग को रेगुलेट करता था।
दूसरा सेबी को एक बाजार नियामक के रूप में शक्तियां देता था। तीसरा डीमैट यानी इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में प्रतिभूतियों के रखरखाव और ट्रांसफर से जुड़ा था। नए विधेयक के जरिए इन सभी को एक ही कानूनी ढांचे में लाने की कोशिश की गई है।
सेबी की भूमिका और संरचना में बदलाव
नए विधेयक में सेबी यानी Securities and Exchange Board of India की संरचना में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। अभी सेबी का बोर्ड नौ सदस्यों का होता है। एसएमसी 2025 के तहत इसे बढ़ाकर 15 सदस्यों का करने का प्रस्ताव है। इसमें छह स्वतंत्र और अंशकालिक सदस्यों को शामिल किया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे सेबी के निर्णयों में बाहरी विशेषज्ञता और विविध दृष्टिकोण आएगा। यह कदम नियामक की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के इरादे से उठाया गया है।
हितों के टकराव पर सख्त प्रावधान
एसएमसी 2025 का एक अहम पहलू सेबी सदस्यों के लिए हितों के टकराव यानी conflict of interest को लेकर है। मौजूदा कानूनों की तुलना में नए विधेयक में इस परिभाषा को ज्यादा व्यापक बनाया गया है। अब किसी सेबी सदस्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित ही नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्यों के हित भी इसमें शामिल होंगे। अगर किसी सदस्य के हित उसके आधिकारिक फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं तो केंद्र सरकार को उसे हटाने की शक्ति दी गई है। इससे सेबी की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ाने की कोशिश की गई है।
जांच और निर्णय प्रक्रिया में बदलाव
विधेयक के तहत जांच अधिकारी और निर्णायक अधिकारी की नियुक्ति को सीमित किया गया है। अब केवल सेबी के पूर्णकालिक सदस्य या सेबी के अधिकारी ही इन पदों पर नियुक्त किए जा सकेंगे। पहले किसी भी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी दी जा सकती थी। हालांकि एक अहम शर्त यह भी जोड़ी गई है कि जो अधिकारी जांच कर रहा है, वही अधिकारी उस मामले में अंतिम फैसला नहीं दे सकता। इससे institutional fairness सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है।
उल्लंघनों के लिए समय सीमा तय
एसएमसी 2025 एक और बड़ा बदलाव लेकर आया है। अब किसी भी कथित उल्लंघन की जांच उल्लंघन की तारीख से आठ साल के भीतर शुरू करनी होगी। अभी तक ऐसी कोई समय सीमा नहीं थी, जिससे पुराने मामले सालों तक लटके रहते थे। हालांकि यह सीमा उन मामलों पर लागू नहीं होगी जिनका बाजार पर system-wide impact हो या जो किसी जांच एजेंसी द्वारा रेफर किए गए हों। इससे निवेशकों और कंपनियों दोनों को एक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
दंड और सजा को लेकर नया दृष्टिकोण
विधेयक में दंड के प्रावधानों को भी संतुलित करने की कोशिश की गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अब केवल monetary penalty यानी आर्थिक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। वहीं गंभीर मामलों में जेल की सजा को बरकरार रखा गया है। इनमें insider trading, निवेशकों के साथ धोखाधड़ी, गैर-सार्वजनिक जानकारी के आधार पर ट्रेडिंग और बाजार कीमतों में हेरफेर जैसे अपराध शामिल हैं। खास बात यह है कि बाजार दुरुपयोग को Prevention of Money Laundering Act के दायरे में लाने का प्रस्ताव भी किया गया है। इससे प्रवर्तन निदेशालय को जांच का अधिकार मिल सकता है।
निवेशक सुरक्षा पर खास फोकस
एसएमसी 2025 में निवेशकों की सुरक्षा को केंद्र में रखा गया है। विधेयक सेबी को निवेशक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने का निर्देश देता है। साथ ही सेवा प्रदाताओं को भी अपने स्तर पर grievance redressal system बनाने होंगे। इसके अलावा सेबी को एक लोकपाल नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है, जो निवेशकों की शिकायतों पर सुनवाई कर सकेगा। इसके साथ ही एक Investor Charter बनाने का भी प्रावधान है, जिससे निवेशकों को उनके अधिकार और जिम्मेदारियों की जानकारी मिलेगी।
बाजार अधोसंरचना संस्थानों की औपचारिक मान्यता
विधेयक में Market Infrastructure Institutions यानी MII की अवधारणा को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है। इसमें स्टॉक एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी शामिल हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार को नई श्रेणियां अधिसूचित करने का अधिकार भी होगा। एमआईआई को अपने उप-नियम बनाने की अनुमति दी गई है ताकि सेवाओं तक गैर-भेदभावपूर्ण पहुंच सुनिश्चित हो सके और बाजार दुरुपयोग को रोका जा सके।
सेबी की बढ़ती शक्तियों पर चिंता
हालांकि इस विधेयक को लेकर कई सकारात्मक पहलू सामने आए हैं, लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई है। उनका मानना है कि एसएमसी 2025 से सेबी के पास अत्यधिक शक्तियां केंद्रित हो सकती हैं। ऐसे में checks and balances को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना जरूरी है ताकि नियामक जवाबदेह बना रहे। कानून का मकसद बाजार को मजबूत बनाना है, न कि शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण।








