रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच डेढ़ घंटे फोन पर बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने ईरान, यूक्रेन और मिडिल ईस्ट संकट पर चर्चा की। पुतिन ने अमेरिका और इजरायल को सैन्य कार्रवाई के गंभीर परिणामों की चेतावनी दी।
रूस/अमेरिका: रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin और अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के बीच बुधवार को करीब डेढ़ घंटे लंबी फोन बातचीत हुई। इस उच्चस्तरीय वार्ता में ईरान, यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक तनाव जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की गई।
क्रेमलिन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति पुतिन ने अमेरिका और इजराइल को ईरान के खिलाफ भविष्य में किसी भी सैन्य कार्रवाई को लेकर गंभीर चेतावनी दी। इस बातचीत को मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक हालात के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
पुतिन ने दी मिडिल ईस्ट में सैन्य कार्रवाई पर चेतावनी
फोन वार्ता के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि अमेरिका और इजराइल ने मिडिल ईस्ट में दोबारा सैन्य अभियान चलाया, तो इसके “बेहद गंभीर और विनाशकारी परिणाम” हो सकते हैं।
रूस लंबे समय से ईरान के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए हुए है। ऐसे में मॉस्को की यह चेतावनी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि रूस नहीं चाहता कि मध्य पूर्व में संघर्ष और व्यापक हो, क्योंकि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, सुरक्षा संतुलन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
यूक्रेन युद्ध पर भी हुई चर्चा
फोन कॉल के दौरान दोनों नेताओं ने यूक्रेन युद्ध और राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy की सरकार के रवैये पर भी चर्चा की।
क्रेमलिन के अनुसार, पुतिन और ट्रंप ने इस बात पर समान राय जताई कि यूक्रेनी नेतृत्व संघर्ष को लंबा खींच रहा है। दोनों नेताओं ने कथित तौर पर युद्ध को समाप्त करने के लिए राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया।
हालांकि अमेरिका की आधिकारिक नीति यूक्रेन के समर्थन में बनी हुई है, लेकिन ट्रंप के हालिया बयानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है।

बातचीत का अंत “गर्मजोशी” के साथ
रूसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फोन कॉल के अंत में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से गर्मजोशी से विदाई ली। इसे संकेत माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच संवाद के चैनल अभी भी सक्रिय हैं, भले ही कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हों।
ईरान को लेकर ट्रंप का सख्त रुख
इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Axios को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ईरान पर अपनी नौसैनिक घेराबंदी तब तक जारी रखेगा, जब तक तेहरान ऐसा समझौता स्वीकार नहीं कर लेता जो उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी चिंताओं को दूर करे।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियां वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं। वहीं ईरान इस दबाव को “आर्थिक और सैन्य आक्रामकता” करार देता रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र
ईरान और अमेरिका के बीच विवाद का एक बड़ा मुद्दा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
ईरान ने प्रस्ताव दिया था कि पहले समुद्री मार्गों पर तनाव कम किया जाए और प्रतिबंधों में राहत दी जाए, जबकि परमाणु वार्ता बाद में आगे बढ़ाई जाए। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज को लेकर बढ़ता तनाव वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकता है।
अमेरिकी सैन्य योजना की रिपोर्ट
Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान पर सीमित लेकिन “तेज और प्रभावशाली” सैन्य हमलों की एक संभावित योजना तैयार की है।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह योजना वार्ता में आए गतिरोध को तोड़ने और ईरान पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इस पर औपचारिक टिप्पणी नहीं की है।
अगर ऐसी कोई सैन्य कार्रवाई होती है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
वैश्विक समुदाय की बढ़ती चिंता
संयुक्त राष्ट्र और कई यूरोपीय देशों ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच टकराव और बढ़ता है, तो यह एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकता है।
साथ ही रूस और अमेरिका के बीच बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि दुनिया की प्रमुख शक्तियां अब सीधे संवाद के जरिए हालात को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं।
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
मिडिल ईस्ट तनाव का असर पहले ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतें चार साल के उच्चतम स्तर के करीब पहुंच चुकी हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य तनाव बढ़ा, तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।











