भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की OMO करने की घोषणा की है। इस कदम का उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करना और नकदी की उपलब्धता को नियंत्रित करना है।
RBI OMO Sale 2026: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। केंद्रीय बैंक इन प्रतिभूतियों की बिक्री ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत करेगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में तरलता को संतुलित करना और अल्पकालिक ब्याज दरों को आरबीआई के नीतिगत रुख के अनुरूप बनाए रखना है।
आरबीआई के इस फैसले को ऐसे समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब भारतीय बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त तरलता बढ़ गई है। अधिक नकदी के कारण ओवरनाइट ब्याज दरें रेपो रेट से नीचे जाने लगी हैं। केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप इस अतिरिक्त धन को सिस्टम से निकालने और मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए किया जा रहा है।
तीन चरणों में होगी सरकारी बॉन्ड की बिक्री
आरबीआई के अनुसार, कुल 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की बिक्री तीन अलग-अलग चरणों में की जाएगी। पहले चरण में 17 सितंबर 2026 को 50,000 करोड़ रुपये की प्रतिभूतियां बेची जाएंगी। इसके बाद 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये और 28 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की बिक्री होगी।
नीलामी मल्टी-सिक्योरिटी और मल्टीपल-प्राइस पद्धति के आधार पर आयोजित की जाएगी। केंद्रीय बैंक के मुताबिक, नीलामी में शामिल होने वाले पात्र प्रतिभागियों को ई-कुबेर सिस्टम के माध्यम से अपनी बोलियां जमा करनी होंगी। 17 सितंबर की नीलामी के लिए बोली जमा करने की अवधि सुबह 9:30 बजे से 10:30 बजे तक निर्धारित की गई है। परिणाम उसी दिन जारी किए जाएंगे।
जिन सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की जाएगी, उनकी परिपक्वता वित्त वर्ष 2028-29 से वित्त वर्ष 2031-32 के बीच होगी। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह करीब दो वर्षों के अंतराल के बाद आरबीआई की पहली शुद्ध OMO बॉन्ड बिक्री है।
बॉन्ड बाजार में दिखा असर

OMO बिक्री की घोषणा के बाद भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में दबाव देखने को मिला। सरकारी प्रतिभूतियों की आपूर्ति बढ़ने की संभावना के चलते बॉन्ड यील्ड में तेजी आई। भारत की बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 6 आधार अंक बढ़कर 7.035 प्रतिशत तक पहुंच गई। वहीं 5-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड लगभग 10 आधार अंक बढ़कर 6.6222 प्रतिशत हो गई। बॉन्ड यील्ड में वृद्धि आम तौर पर उनकी कीमतों पर दबाव को दर्शाती है।
बैंकिंग सिस्टम में क्यों बढ़ी अतिरिक्त नकदी?
भारतीय वित्तीय प्रणाली में हाल के दिनों में तरलता बढ़ने के पीछे कई कारक बताए जा रहे हैं। बैंकों ने आरबीआई की विशेष विदेशी मुद्रा जुटाव योजना के तहत उम्मीद से अधिक धन जुटाया। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई और बैंकिंग प्रणाली में रुपये की तरलता बढ़ी। जब बैंकों के पास जरूरत से अधिक नकदी होती है, तो वे उसे कम अवधि के लिए दूसरे बैंकों को उधार दे सकते हैं।
इससे ओवरनाइट बाजार में ब्याज दरों पर दबाव पड़ता है और वे केंद्रीय बैंक की रेपो दर से नीचे जा सकती हैं। आरबीआई के लिए यह स्थिति मौद्रिक नीति के प्रभावी संचालन के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
महंगाई के मोर्चे पर भी नजर
आरबीआई का तरलता प्रबंधन ऐसे समय हो रहा है, जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार वृद्धि से घरेलू महंगाई और आयात लागत पर दबाव बढ़ सकता है।
अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने से आरबीआई को वित्तीय परिस्थितियों को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, OMO बिक्री का असर बॉन्ड यील्ड, बाजार में उधारी की लागत और व्यापक वित्तीय परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।












