Bihar की RLM पार्टी संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। टूट की आशंका को देखते हुए आलोक सिंह को बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाने की तैयारी की जा रही है। पार्टी नेतृत्व इसे असंतोष कम करने और संतुलन बनाये रखने का कदम मान रहा है।
Patna: बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) इन दिनों गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीतने के बाद जिस पार्टी ने खुद को मजबूत दावेदार के रूप में पेश किया था, वही पार्टी अब संगठनात्मक असंतोष और संभावित टूट की चर्चाओं से जूझ रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी ने नेतृत्व को डैमेज कंट्रोल (damage control) मोड में आने के लिए मजबूर कर दिया है।
इसी कड़ी में दिनारा से विधायक आलोक सिंह को बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की तैयारी को एक बड़े संगठनात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस फैसले का मकसद पार्टी में बढ़ती नाराजगी को शांत करना और टूट की आशंकाओं पर रोक लगाना है। आज इस फैसले की औपचारिक घोषणा भी हो सकती है।
संगठन को संभालने की रणनीति
सूत्रों के अनुसार, RLM नेतृत्व को यह अहसास हो चुका है कि अगर समय रहते सख्त और संतुलित फैसले नहीं लिए गए, तो पार्टी में टूट तय मानी जाएगी। इसी वजह से उपेंद्र कुशवाहा ने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव का मन बनाया है। आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पार्टी के भीतर सहमति के करीब पहुंच चुका है।
यह फैसला केवल पद परिवर्तन नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पार्टी को एकजुट रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि RLM किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन में सभी विधायकों और नेताओं की भूमिका अहम है।
पटना बैठक में बनी सहमति
हाल ही में पटना में RLM के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा से पार्टी के वरिष्ठ नेता माधव आनंद और विधायक आलोक सिंह की अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में पार्टी की मौजूदा स्थिति, विधायकों की नाराजगी और संगठनात्मक संतुलन पर विस्तार से चर्चा की गई।
इसी बैठक में आलोक सिंह को बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर सहमति बनी। माना जा रहा है कि यह फैसला काफी सोच-समझकर लिया गया है ताकि पार्टी में चल रहे असंतोष को कम किया जा सके और भविष्य की राजनीतिक रणनीति को मजबूत किया जा सके।
नेतृत्व में संतुलन बनाने की कोशिश
फिलहाल RLM में संगठन और विधायकों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा पहले से तय है। माधव आनंद विधायक दल के नेता की भूमिका में हैं, जबकि स्नेहलता कुशवाहा सचेतक के पद पर हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी अन्य विधायक को सौंपना नेतृत्व संतुलन की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

इस फैसले के जरिए पार्टी नेतृत्व यह दिखाना चाहता है कि संगठन में फैसले केवल पारिवारिक दायरे में नहीं लिए जाते। इससे पार्टी के भीतर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सभी क्षेत्रों और वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।
शाहाबाद क्षेत्र पर राजनीतिक फोकस
आलोक सिंह को आगे लाने के पीछे क्षेत्रीय राजनीति का पहलू भी बेहद अहम है। वे शाहाबाद क्षेत्र से आते हैं, जहां RLM अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। यह इलाका बिहार की राजनीति में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि शाहाबाद जैसे क्षेत्र में मजबूत नेतृत्व खड़ा करने से संगठन को जमीनी स्तर पर फायदा मिलेगा। आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी वहां अपनी राजनीतिक मौजूदगी को और प्रभावी बनाना चाहती है।
जातीय संतुलन साधने की कोशिश
RLM के इस फैसले में जातीय समीकरण (caste balance) की भूमिका भी साफ नजर आती है। उपेंद्र कुशवाहा कुशवाहा समाज से आते हैं, जबकि आलोक सिंह राजपूत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में यह कदम सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं। पार्टी नेतृत्व यह समझता है कि अगर संगठन को मजबूत करना है, तो सामाजिक संतुलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आलोक सिंह को आगे लाकर पार्टी इसी दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है।
बेटे को मंत्री बनाने से बढ़ी नाराजगी
दरअसल, RLM में असंतोष की जड़ चुनाव के बाद लिए गए कुछ फैसलों से जुड़ी मानी जा रही है। चुनाव के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवाया, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। इस फैसले से पार्टी के अन्य विधायकों में नाराजगी बढ़ गई।
माना जा रहा था कि वरिष्ठ नेता माधव आनंद को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन उन्हें केवल विधायक दल नेता की भूमिका तक सीमित रखा गया। इससे पार्टी के भीतर यह धारणा बनी कि नेतृत्व में पारदर्शिता और संतुलन की कमी है।
दिल्ली दौरे से तेज हुई बगावत की चर्चा
असंतोष की आग तब और भड़क गई, जब लोकसभा शीतकालीन सत्र के बाद पटना में आयोजित लिट्टी पार्टी में RLM के तीनों विधायक शामिल नहीं हुए। कार्यक्रम से ठीक पहले वे दिल्ली रवाना हो गए और वहां भाजपा नेता नितिन नबीन से मुलाकात की।
इस मुलाकात के बाद पार्टी में टूट की अटकलें और तेज हो गईं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा होने लगी कि RLM के विधायक दूसरी पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं। इसी वजह से पार्टी नेतृत्व पर तुरंत कदम उठाने का दबाव बढ़ गया।










