गुरुवार, 2 अप्रैल 2026 को रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 2 प्रतिशत बढ़त दर्ज की और 12 साल में सबसे बड़ी मजबूती दिखाई। आरबीआई के कदम और बाजार की स्थिरता से विदेशी निवेशकों में भरोसा बढ़ा।
Rupee to Dollar: गुरुवार, 2 अप्रैल 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में जोरदार मजबूती देखने को मिली। खुलते ही रुपये ने 1.4 प्रतिशत की तेजी दिखाई और डॉलर के मुकाबले 93.53 पर पहुंच गया। इस तेजी के साथ रुपये ने 2013 के बाद अपनी सबसे बड़ी एकदिनी बढ़त दर्ज की। तब भी भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को स्थिर रखने के लिए असाधारण कदम उठाए थे।
दोपहर तक रुपये ने 2 प्रतिशत से अधिक मजबूती दिखाई और डॉलर के मुकाबले 92.8350 पर पहुंच गया। इससे पहले रुपये का स्तर 95.21 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की तेज बढ़त आखिरी बार सितंबर 2013 में देखी गई थी। उस समय भी आरबीआई के आपातकालीन कदम और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के टेपरिंग प्रोग्राम में राहत मिलने से रुपये को सहारा मिला था।
रुपये मजबूत होने के पीछे RBI के कदम
रुपये की मजबूती का मुख्य कारण भारतीय रिजर्व बैंक का कड़ा कदम माना जा रहा है। आरबीआई ने बैंकों को रुपये के ऑफशोर कारोबार के सबसे लोकप्रिय साधन की पेशकश करने से रोक दिया है। इससे प्रतिदिन 149 अरब डॉलर के बाजार पर दबाव कम हुआ है। यह कदम गिरती मुद्रा को संभालने के लिए उठाया गया एक महत्वपूर्ण उपाय है।
आरबीआई ने सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने और रुपये को सहारा देने के लिए कई सख्त कदम लागू किए हैं। इस साल रुपये लगातार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच रहा था। पश्चिम एशिया में युद्ध और ईरान के तनाव ने इस दबाव को और बढ़ा दिया था।
पहले उठाया गया कदम

रुपए की गिरावट को रोकने के लिए पहला कदम शुक्रवार देर रात उठाया गया। इस कदम के तहत नियामकों ने बैंकों की दैनिक ऑनशोर मुद्रा पोजीशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित कर दिया। इस फैसले के बाद बैंकों को कम से कम 30 अरब डॉलर के आर्बिट्राज सौदों को समेटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
ऑफशोर डेरिवेटिव पर रोक
जब बैंकों की पोजीशन सीमित करने के बाद भी रुपये की गिरावट नहीं रुकी, तो आरबीआई ने कुछ नॉन-डिलीवेरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की पेशकश पर रोक लगा दी। यह कदम खासतौर पर ऑफशोर बाजार को लक्षित था। ऑफशोर बाजार में औसतन 149 अरब डॉलर प्रतिदिन का कारोबार होता है, जो ऑनशोर बाजार से लगभग दोगुना है। इस प्रतिबंध ने विदेशी मुद्रा बाजार में निवेशकों की गतिविधियों को नियंत्रित करने में मदद की।
डॉलर के मुकाबले रुपये का रुख
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये में तेजी निवेशकों के लिए राहत का संकेत है। डॉलर के मुकाबले रुपये का यह स्तर न केवल विदेशी निवेशकों के भरोसे को बढ़ाता है, बल्कि आयात और निर्यात पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है। रुपये की मजबूती से ईंधन और कच्चे माल के आयात की लागत कम हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति पर नियंत्रण में मदद मिलती है।
बाजार पर संभावित असर
रुपये में यह तेज बढ़त शेयर बाजार और कमोडिटी मार्केट पर भी असर डाल सकती है। मजबूत रुपये से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में फिर से भरोसा दिखा सकते हैं। वहीं, आयातित वस्तुओं की लागत घटने से उद्योगों को उत्पादन लागत में राहत मिल सकती है।








