मराठी और हिंदी सिनेमा में अपनी दमदार पहचान बना चुकीं अभिनेत्री सई ताम्हणकर इन दिनों अपनी नई वेब सीरीज मटका किंग को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने करियर, इंडस्ट्री के टैग, पे-पैरिटी और टाइपकास्टिंग जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर बात की।
एंटरटेनमेंट न्यूज़: Sai Tamhankar ने हाल ही में अपने करियर और संघर्ष के सफर पर बात करते हुए कहा कि “जो मेहनत करता है, उसे फल जरूर मिलता है। मराठी और हिंदी सिनेमा दोनों में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी सई ताम्हणकर ने कई फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में अपनी वर्सेटाइल एक्टिंग से दर्शकों का दिल जीता है।
Duniyadari, Hunter, Mimi और Dabba Cartel जैसे प्रोजेक्ट्स में उनके अभिनय को काफी सराहा गया है। अपने करियर को लेकर वह इसे एक ग्रेसफुल यात्रा मानती हैं और खुद को काफी विनम्र बताती हैं।
“मैं टॉमबॉय थी, कबड्डी और कराटे खेलती थी” - सई
सई ताम्हणकर ने अपने बचपन और शुरुआती जीवन को याद करते हुए बताया कि उनका व्यक्तित्व बचपन से ही अलग और आत्मनिर्भर रहा है। उन्होंने कहा कि उनके पिता समुद्री जहाजों पर काम करते थे और अक्सर घर से दूर रहते थे, जबकि उनकी मां ने उन्हें मजबूत और स्वतंत्र बनना सिखाया। ने बताया:
- स्कूल में वे “कबड्डी गर्ल” के नाम से जानी जाती थीं
- उन्होंने कराटे सीखा और ऑरेंज बेल्ट हासिल किया
- कॉलेज तक उनका हेयरकट बॉय-स्टाइल था
- वे खुद को हमेशा टॉमबॉय मानती थीं
उनका कहना है कि उनके इसी स्वभाव ने उन्हें इंडस्ट्री में आत्मविश्वासी बनाया।
“हर लड़की को दबंग और आत्मनिर्भर होना चाहिए”
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सई ताम्हणकर ने कहा कि महिलाओं को मजबूत और आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि समाज में लड़कियों को खुद के लिए खड़ा होना चाहिए और किसी भी गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके बिंदास स्वभाव की वजह से लोग उनके सामने गलत व्यवहार करने से हिचकते हैं।
इंडस्ट्री में “रीजनल एक्ट्रेस” के लेबल पर बात करते हुए सई ने कहा कि यह टैग आज भी कई कलाकारों को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि मराठी और हिंदी दोनों इंडस्ट्री में काम करने के बावजूद उन्हें कभी-कभी इस तरह के वर्गीकरण का सामना करना पड़ा है। सई ने स्पष्ट कहा:
- कलाकारों को भाषा के आधार पर नहीं, काम के आधार पर आंका जाना चाहिए
- अब धीरे-धीरे यह सोच बदल रही है
- लेकिन अभी भी इस मानसिकता को पूरी तरह खत्म करना बाकी है
उन्होंने कहा कि फिल्म मिमी जैसी परियोजनाओं ने उनके करियर को नई पहचान दिलाई और उन्हें इस टैग से बाहर निकलने में मदद की।
टाइपकास्टिंग पर भी खुलकर बोलीं
सई ताम्हणकर ने कहा कि इंडस्ट्री में कलाकारों को अक्सर एक ही तरह के रोल्स में सीमित कर दिया जाता है, जिससे उनका विकास रुक जाता है। उन्होंने इसे “सिस्टम का पुराना पैटर्न” बताया और कहा कि इससे बाहर निकलना आसान नहीं होता। उनके अनुसार:
- नए और अलग रोल्स चुनना जरूरी है
- लेकिन यह हर कलाकार के लिए संभव नहीं होता
- समाज और इंडस्ट्री दोनों ही कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित हैं
- बदलते समय की ओर इशारा
सई ने माना कि पिछले कुछ वर्षों में इंडस्ट्री में काफी बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि प्रियंका चोपड़ा और सामंथा रुथ प्रभु जैसी अभिनेत्रियों ने इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है।









