शबरी जयंती 2026 फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर 8 फरवरी को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान राम की अनन्य भक्त माता शबरी की भक्ति, प्रेम और सामाजिक समानता के संदेश से जुड़ा है। पूजा, रामायण पाठ और दान का विशेष महत्व माना गया है।
Shabari Jayanti: शबरी जयंती वर्ष 2026 में 8 फरवरी को पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को आता है और भगवान श्रीराम की भक्त माता शबरी की स्मृति से जुड़ा है। पंचांग के अनुसार तिथि रात में शुरू होने के कारण भ्रम रहता है, लेकिन उदयातिथि के आधार पर 8 फरवरी को ही पर्व मनाया जाएगा। यह दिन सच्ची भक्ति, सामाजिक समरसता और निष्कपट प्रेम के महत्व को समझाने के लिए जाना जाता है।
शबरी जयंती 2026 कब है
शबरी जयंती हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि रविवार, 8 फरवरी की रात 2:54 बजे से शुरू होकर 9 फरवरी की सुबह 5:01 बजे तक रहेगी। हिंदू धर्म में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए शबरी जयंती 8 फरवरी 2026 को ही मनाई जाएगी।
कई बार तिथियों का आरंभ रात में होने के कारण लोगों में असमंजस की स्थिति बन जाती है। इसी वजह से कुछ लोग 7 फरवरी की संभावना भी जताते हैं, लेकिन धार्मिक दृष्टि से सही तिथि 8 फरवरी ही मानी गई है।
कौन थीं माता शबरी
रामायण के अनुसार, माता शबरी एक तपस्विनी थीं, जो ऋषि मतंग की शिष्या थीं। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा में व्यतीत किया। गुरु मतंग ने उन्हें वरदान दिया था कि भगवान राम स्वयं उनके आश्रम में दर्शन देंगे। इसी विश्वास के साथ माता शबरी वर्षों तक प्रतिदिन आश्रम की साफ-सफाई करती रहीं, मार्ग को बुहारती रहीं और भगवान राम के आगमन की प्रतीक्षा करती रहीं।
जब भगवान श्रीराम, माता सीता की खोज में वनवास के दौरान शबरी के आश्रम पहुंचे, तो माता शबरी ने उन्हें प्रेमपूर्वक बेर खिलाए। यही प्रसंग आगे चलकर ‘शबरी के जूठे बेर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

शबरी के जूठे बेर की कथा और उसका संदेश
रामायण की यह कथा भक्ति साहित्य में सबसे भावुक प्रसंगों में से एक मानी जाती है। कथा के अनुसार, माता शबरी भगवान राम को बेर खिलाने से पहले हर बेर को स्वयं चखती थीं, ताकि कोई खट्टा या खराब फल प्रभु को न मिले। बाहरी दृष्टि से यह जूठा भोजन था, लेकिन भगवान राम ने उसे सहर्ष स्वीकार किया।
भगवान राम ने इसे माता शबरी के सच्चे प्रेम और निष्कपट भक्ति का प्रतीक माना। इस प्रसंग के जरिए यह संदेश दिया गया कि भगवान को शुद्धता नहीं, बल्कि भक्त की भावना प्रिय होती है। इसी भक्ति के प्रतिफलस्वरूप भगवान राम ने माता शबरी को उसी क्षण मोक्ष प्रदान किया।
शबरी जयंती पूजा विधि
शबरी जयंती के दिन भगवान राम के साथ माता शबरी की पूजा का विधान है। इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होते हैं और घर के मंदिर की साफ-सफाई करते हैं।
पूजा स्थल पर माता शबरी और राम दरबार की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद धूप, दीप, फूल, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इस दिन भगवान राम को बेर का भोग अवश्य लगाया जाता है, क्योंकि यह माता शबरी की भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
शबरी जयंती के अवसर पर रामायण के शबरी प्रसंग का पाठ करना विशेष फलदायी बताया गया है। पूजा के बाद सामर्थ्य अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, फल या वस्त्र का दान करना भी शुभ माना जाता है।
शबरी जयंती का धार्मिक और सामाजिक महत्व
शबरी जयंती केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता का भी संदेश देती है। माता शबरी एक वनवासी महिला थीं, जिन्हें समाज के निचले वर्ग से जोड़ा जाता है। बावजूद इसके, भगवान राम ने उन्हें समान आदर दिया और उनके प्रेम को स्वीकार किया।
यह पर्व यह सिखाता है कि भक्ति में कोई ऊंच-नीच नहीं होती। सच्ची श्रद्धा और प्रेम के आगे भगवान स्वयं झुक जाते हैं। यही कारण है कि शबरी जयंती आज भी समाज को समानता, प्रेम और सेवा का संदेश देती है।
आज के समय में शबरी जयंती की प्रासंगिकता
आधुनिक समय में जब आडंबर और दिखावे को भक्ति का पर्याय मान लिया गया है, तब शबरी जयंती हमें मूल भाव की ओर लौटने की प्रेरणा देती है। माता शबरी का जीवन यह सिखाता है कि धैर्य, प्रतीक्षा और निस्वार्थ प्रेम से ही जीवन में सच्ची शांति मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पर्व केवल धार्मिक परंपरा नहीं होते, बल्कि समाज को नैतिक मूल्यों से जोड़ने का माध्यम भी होते हैं। शबरी जयंती हमें सिखाती है कि भक्ति का मार्ग सरल है, यदि मन शुद्ध हो।











