शंकर बाबा पापलकर कौन हैं? 123 अनाथ बच्चों के बने पिता, 12 को दिलाई सरकारी नौकरी

शंकर बाबा पापलकर ने 123 अनाथ और बेसहारा बच्चों को अपना नाम और परिवार दिया। उनके आश्रम के 12 बच्चे सरकारी नौकरी में पहुंचे, जबकि माला ने MPSC पास की।

महाराष्ट्र के शंकर बाबा पापलकर ने 123 अनाथ और बेसहारा बच्चों को अपना नाम और परिवार दिया। उनके आश्रम में पले 12 बच्चे सरकारी नौकरी तक पहुंचे, जबकि दृष्टिबाधित माला ने MPSC परीक्षा पास कर मिसाल कायम की।

Inspiring Story in Hindi: महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शंकर बाबा पापलकर ने अपना जीवन अनाथ, बेसहारा और दिव्यांग बच्चों की देखभाल, शिक्षा और पुनर्वास के लिए समर्पित किया। उन्होंने 123 बच्चों के आधार कार्ड पर पिता के रूप में अपना नाम दर्ज कराया। उनके आश्रम में पले-बढ़े 12 बच्चे सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं, जिनमें दृष्टिबाधित माला भी शामिल हैं।

कौन हैं शंकर बाबा पापलकर?

शंकर बाबा पुंडलीकराव पापलकर महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के सोशल वर्कर हैं। उनका जन्म 14 फरवरी 1942 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ था। उन्होंने अपना जीवन अनाथ, मूक-बधिर तथा मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चों के कल्याण, शिक्षा और पुनर्वास के लिए समर्पित किया।

साल 1990 में उन्होंने अमरावती जिले के वझ्झर गांव की एक पहाड़ी पर चार अनाथ बच्चों के साथ अनाथालय की शुरुआत की। धीरे-धीरे उनके आश्रम में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई, जिन्हें परिवार और समाज से सहारे की जरूरत थी।

123 बच्चों के बने कानूनी पिता

शंकर बाबा ने केवल इन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी नहीं उठाई, बल्कि उन्हें परिवार और पहचान देने की कोशिश भी की। उन्होंने 123 अनाथ और बेसहारा बच्चों के आधार कार्ड पर पिता के रूप में अपना नाम दर्ज कराया। इन बच्चों को उन्होंने अपना सरनेम भी दिया।

हालांकि, बच्चों की परवरिश और उन्हें 18 साल की उम्र के बाद भी आश्रम में रखने का रास्ता आसान नहीं था। सरकारी नियमों के अनुसार अनाथालयों में बच्चे आम तौर पर 18 वर्ष की उम्र तक रह सकते हैं। इसके बाद विशेष जरूरत वाले बच्चों के सामने रहने, सुरक्षा और पुनर्वास की चुनौती खड़ी हो जाती थी।

शंकर बाबा ने इस व्यवस्था को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी। उनका कहना था कि मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चे 18 वर्ष की उम्र के बाद अचानक आत्मनिर्भर नहीं हो जाते। उनका उद्देश्य था कि ऐसे बच्चों को आगे भी सुरक्षित वातावरण, देखभाल और पुनर्वास मिलता रहे।

12 बच्चे सरकारी नौकरी में पहुंचे

शंकर बाबा के आश्रम में पले-बढ़े 12 बच्चे सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं। इनमें जन्म से दृष्टिबाधित माला की कहानी खास तौर पर उल्लेखनीय है।

माला को शंकर बाबा ने जलगांव रेलवे स्टेशन पर कूड़े के ढेर से उठाया था। उन्होंने माला को अपना नाम दिया और उसकी शिक्षा का इंतजाम किया। माला ने ब्रेल के माध्यम से पढ़ाई की और आगे उच्च शिक्षा हासिल की।

इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की ग्रुप C परीक्षा पास की। अक्टूबर 2025 में उन्हें नियुक्ति पत्र मिला और नागपुर कलेक्ट्रेट में रेवेन्यू असिस्टेंट के पद पर नियुक्त किया गया।

माला की सफलता को शंकर बाबा ने केवल एक परीक्षा में मिली कामयाबी के तौर पर नहीं देखा। उनके लिए यह इस बात का उदाहरण था कि उचित अवसर और सहयोग मिलने पर आश्रम में पले-बढ़े बच्चे भी अपना भविष्य खुद बना सकते हैं।

2024 में मिला पद्म श्री सम्मान

बच्चों के कल्याण और पुनर्वास के लिए लंबे समय तक किए गए काम के लिए शंकर बाबा पापलकर को 2024 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। सम्मान की घोषणा के बाद भी उन्होंने अपनी उपलब्धि से ज्यादा उन दिव्यांग और अनाथ बच्चों के बारे में बात की, जिनके साथ उन्होंने अपना जीवन बिताया है।

पद्म श्री मिलने के बाद उन्होंने यह सम्मान दिव्यांग बच्चों को समर्पित किया। उनके लिए यह पुरस्कार व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा उन बच्चों के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों की पहचान है, जिन्हें उन्होंने वर्षों तक परिवार, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का रास्ता देने का प्रयास किया।

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