Share Market Crash: 25 साल में पहली बार 8 हफ्ते लगातार गिरा बाजार, कोरोना काल का रिकॉर्ड भी टूटा

Share Market Crash: सेंसेक्स और निफ्टी लगातार 8वें हफ्ते गिरावट के साथ बंद हुए, जो 25 साल की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है। जानें बाजार में गिरावट की बड़ी वजहे

घरेलू शेयर बाजार में लगातार आठवें हफ्ते गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय इक्विटी बेंचमार्क में यह पिछले 25 वर्षों की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट बताई जा रही है। गुरुवार को अमेरिका में 10 साल की बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल के बीच भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली।

Share Market: भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला लगातार आठवें हफ्ते भी जारी रहा। Nifty 50 और BSE Sensex दोनों में लगातार आठ सप्ताह साप्ताहिक गिरावट दर्ज की गई, जो करीब 25 वर्षों में सबसे लंबा गिरावट का दौर है। इससे पहले 2001 में भारतीय बाजार लगातार नौ सप्ताह तक कमजोर रहा था। कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में भी बाजार में लगातार सात सप्ताह की गिरावट देखने को मिली थी।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026 को भी घरेलू शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव रहा। कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 1,200 अंक तक फिसला, जबकि निफ्टी 22,300 के स्तर से नीचे चला गया। हालांकि, अंतिम घंटे में कुछ रिकवरी देखने को मिली। दिन के अंत में सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 प्रतिशत गिरकर 71,909.70 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 50 198.50 अंक यानी 0.88 प्रतिशत टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ।

8 हफ्तों में बाजार में कितनी गिरावट?

लगातार आठ सप्ताह की गिरावट के दौरान निफ्टी और सेंसेक्स में करीब 9 प्रतिशत की कमजोरी आई है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में निफ्टी लगभग 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 8.4 प्रतिशत नीचे आया। सितंबर में दोनों प्रमुख सूचकांकों में लगभग 6 प्रतिशत की मासिक गिरावट दर्ज हुई, जो मार्च के बाद सबसे बड़ी मासिक गिरावट रही।

यह गिरावट ऐसे समय आई है जब वैश्विक बाजारों में भी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमत और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को लेकर निवेशकों की चिंता बढ़ी हुई है। बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी के बाहर जाने का दबाव भी बढ़ाया है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बनी बड़ी चिंता

भारतीय बाजार में हालिया बिकवाली के पीछे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेज वृद्धि को प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.3 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई, जो लंबे समय के ऊंचे स्तरों में से एक है। ऊंची अमेरिकी यील्ड के कारण डॉलर आधारित परिसंपत्तियां निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकती हैं, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी निकासी का दबाव बढ़ता है।

इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भी भारतीय बाजार के लिए चिंता बढ़ाई है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए तेल की कीमत बढ़ने से आयात बिल और मुद्रास्फीति से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं।

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली

भारतीय शेयर बाजार की कमजोरी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली भी महत्वपूर्ण कारक रही है। सितंबर 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से करीब 44,000 करोड़ रुपये की निकासी की। इस दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने बाजार को कुछ सहारा दिया, लेकिन विदेशी पूंजी की लगातार निकासी से दबाव बना रहा।

1 अक्टूबर को भी विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर बाजार पर दिखाई दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, इससे पहले 30 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने एक ही दिन में 10,148 करोड़ रुपये से अधिक के भारतीय शेयर बेचे थे।

रुपये पर भी बढ़ा दबाव

शेयर बाजार की गिरावट के साथ भारतीय रुपया भी दबाव में रहा। गुरुवार को रुपया करीब 0.5 प्रतिशत कमजोर होकर 96.31 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। मजबूत डॉलर, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और विदेशी निवेशकों की निकासी ने रुपये पर दबाव बढ़ाया। रुपये में कमजोरी का असर उन कंपनियों पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है जो आयात या निर्यात पर निर्भर हैं। खास तौर पर तेल आयातकों के लिए कमजोर रुपया लागत बढ़ा सकता है, जबकि डॉलर में कमाई करने वाली कुछ कंपनियों को इससे फायदा मिल सकता है।

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