भारत में शतरंज ग्रैंडमास्टर बनने की राह बेहद महंगी हो गई है। कोचिंग, विदेशी टूर्नामेंट और ट्रेनिंग पर 50 से 70 लाख रुपये तक खर्च आता है। कई परिवारों को गहने और संपत्ति तक बेचनी पड़ रही है।
स्पोर्ट्स: शतरंज को अक्सर एक सस्ता और बुद्धि-आधारित खेल माना जाता है, जिसमें न तो बड़े स्टेडियम की जरूरत होती है और न ही महंगे खेल उपकरणों की। लेकिन भारत में तेजी से उभरते ग्रैंडमास्टर्स की कहानी इस धारणा को पूरी तरह बदल रही है। वास्तविकता यह है कि एक बच्चे को शतरंज में ग्रैंडमास्टर (GM) बनाने के लिए परिवारों को औसतन 50 से 70 लाख रुपये तक का भारी खर्च उठाना पड़ता है।
हाल के वर्षों में भारत के नए ग्रैंडमास्टर्स की सफलता के पीछे उनके परिवारों द्वारा किए गए बड़े आर्थिक त्याग सामने आए हैं, जिसने इस खेल की “सस्ती प्रतिभा विकास” वाली छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रैंडमास्टर बनने की कीमत: लाखों रुपये का सफर
हाल ही में भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर बने आरोन्यक घोष और 94वें ग्रैंडमास्टर मयंक चक्रवर्ती की सफलता इस संघर्ष की सबसे बड़ी मिसाल मानी जा रही है। आरोन्यक के पिता मृणाल घोष के अनुसार, उन्होंने अपने बेटे की ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं पर पिछले 15 वर्षों में लगभग 46 लाख रुपये खर्च किए।
उनका कहना है कि यह राशि भारत में किसी भी खिलाड़ी को ग्रैंडमास्टर बनाने के लिए सबसे कम खर्चों में से एक हो सकती है। इसके बावजूद यह रकम एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बेहद भारी है।
परिवारों के त्याग: जमीन और गहने तक बेचने पड़े
आरोन्यक घोष के अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भाग लेने और अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म हासिल करने की यात्रा आसान नहीं रही। बैंकॉक चेस क्लब ओपन में निर्णायक सफलता के दौरान परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
परिवार ने खर्च जुटाने के लिए पुश्तैनी जमीन तक बेच दी, जबकि उनकी मां संचिता घोष को अपने शादी के गहने तक बेचने पड़े। इनाम की राशि भी पूरी तरह खिलाड़ी की ट्रेनिंग और टूर्नामेंट में वापस लगाई गई।
70 लाख तक पहुंच सकता है कुल खर्च
पूर्वोत्तर भारत के पहले और एकमात्र ग्रैंडमास्टर मयंक चक्रवर्ती की मां मोनोमिता चक्रवर्ती का कहना है कि एक खिलाड़ी को ग्रैंडमास्टर बनने तक कम से कम 70 लाख रुपये तैयार रखने चाहिए।

उनके अनुसार, यह खर्च केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट, यात्रा, कोचिंग और तैयारी शिविरों में लगातार निवेश करना पड़ता है।
कोचिंग और विदेशी टूर्नामेंट सबसे बड़ा खर्च
शतरंज में सबसे बड़ा खर्च कोचिंग और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने का होता है। ग्रैंडमास्टर स्तर के कोच की फीस 10,000 से 20,000 रुपये प्रति घंटे तक पहुंच जाती है। एक खिलाड़ी को अक्सर एक से अधिक कोच रखने पड़ते हैं।
इसके अलावा, ग्रैंडमास्टर नॉर्म हासिल करने के लिए हर साल 6 से 8 बार यूरोप या अन्य महंगे देशों में टूर्नामेंट खेलना पड़ता है, जिसका खर्च 15 से 20 लाख रुपये तक हो सकता है।
इसके साथ ही ट्रेनिंग पार्टनर और सेकेंड्स (मैच तैयारी विशेषज्ञ) को भी भुगतान करना पड़ता है, जो कई बार इनामी राशि में हिस्सा मांगते हैं।
परिवारों पर बढ़ता आर्थिक दबाव
गुवाहाटी के मयंक चक्रवर्ती जैसे खिलाड़ियों के परिवारों को विदेशी टूर्नामेंटों के दौरान अतिरिक्त खर्च उठाने पड़ते हैं, जैसे कनेक्टिंग फ्लाइट और लंबे ठहराव।
खर्च बचाने के लिए कई परिवार यूरोप में साझा अपार्टमेंट में रहते हैं और भारत से घर का बना खाना साथ ले जाते हैं। यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने के लिए परिवारों को कितना संघर्ष करना पड़ता है।
स्पॉन्सरशिप की कमी बनी बड़ी चुनौती
भारत में शतरंज खिलाड़ियों के लिए स्पॉन्सरशिप हासिल करना बेहद कठिन है। पहले मिलने वाली सरकारी सहायता और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की कुछ योजनाएं अब सीमित हो चुकी हैं।
इसके कारण खिलाड़ियों को पूरी तरह अपने परिवारों की आर्थिक क्षमता पर निर्भर रहना पड़ता है। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी केवल संसाधनों की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ पाते।
2500 रेटिंग के बाद भी खत्म नहीं होता संघर्ष
विशेषज्ञों के अनुसार, जब खिलाड़ी 2500 रेटिंग पार कर लेते हैं, तब कुछ अंतरराष्ट्रीय आयोजक उनके रहने और यात्रा का खर्च उठाते हैं। लेकिन कई खिलाड़ी जैसे आरोन्यक घोष अभी भी इस सीमा से नीचे हैं, जिसके कारण उन्हें लगातार अपने खर्च खुद उठाने पड़ते हैं।










