कर्नाटक विधानसभा के विशेष सत्र में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सीमित भागीदारी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। सूखे, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और विधायक यशवंतारायगौड़ा पाटिल के इस्तीफे पर बहस के दौरान उनकी चुप्पी पर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं।
बेंगलुरु: कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का विधानसभा में बदला हुआ रुख इन दिनों राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। सदन में आंकड़ों और सरकारी रिकॉर्ड के साथ विपक्ष के तर्कों का जवाब देने के लिए पहचाने जाने वाले सिद्धारमैया मौजूदा विशेष सत्र में अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रहे हैं। सूखे और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान भी उनकी सक्रिय भागीदारी सीमित रही है।
सिद्धारमैया पहले भी विधानसभा में अपनी विस्तृत दलीलों और मुखर हस्तक्षेप के लिए जाने जाते रहे हैं। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सदन में उनकी कम भागीदारी ने कांग्रेस और विपक्ष, दोनों खेमों में उनके मौजूदा राजनीतिक रुख को लेकर चर्चा शुरू कर दी है।
विशेष सत्र में मौजूद, लेकिन बहस से दूरी
कर्नाटक विधानसभा का विशेष सत्र राज्य में सूखे की स्थिति और पश्चिमी घाट से जुड़े कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के मुद्दे पर चर्चा के लिए आयोजित किया गया था। इस दौरान सिद्धारमैया सदन में मौजूद रहे, लेकिन उन्होंने बहस में वैसी सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, जैसी उनके मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता रहते देखने को मिलती थी।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर विधानसभा ने 22 सितंबर को सर्वसम्मति से समीक्षा और आवश्यक संशोधन की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। राज्य सरकार ने पश्चिमी घाट के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों का भौतिक सर्वेक्षण कराने और केंद्र से रिपोर्ट पर पुनर्विचार का आग्रह करने का फैसला किया।
सूखे का मुद्दा भी विशेष सत्र के केंद्र में रहा। सितंबर में कमजोर मानसून के कारण राज्य के कई तालुकों में सूखे की स्थिति सामने आई है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने केंद्र से राहत राशि जल्द जारी करने की मांग भी की है।
कभी आंकड़ों के साथ विपक्ष को देते थे जवाब
सिद्धारमैया की मौजूदा चुप्पी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि विधानसभा में उनका राजनीतिक अंदाज लंबे समय तक इसके बिल्कुल विपरीत रहा है। मुख्यमंत्री रहते हुए और उससे पहले विपक्ष के नेता के रूप में भी वे विपक्ष के सवालों का जवाब आंकड़ों, सरकारी दस्तावेजों और नीतिगत तथ्यों के साथ देने के लिए जाने जाते थे।
विधानसभा की बहसों में उनकी विस्तृत भागीदारी कांग्रेस की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सदन में उनकी सीमित सक्रियता को राजनीतिक पर्यवेक्षक अलग नजरिए से देख रहे हैं।
हालांकि, सिद्धारमैया की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई बयान सामने नहीं आया है जिसमें उन्होंने विधानसभा में अपेक्षाकृत शांत रहने के कारण की स्पष्ट व्याख्या की हो।
आखिरी पंक्ति में बैठने पर भी नजर
विशेष सत्र के दौरान सिद्धारमैया सदन की आखिरी पंक्ति में बैठे दिखाई दिए। इस दौरान मंत्री, विधायक और कुछ मौकों पर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार भी उनसे बातचीत करने के लिए पहुंचे।
उनके पास आम तौर पर बैठने वाले कांग्रेस नेता के.एन. राजन्ना भी सत्र की बहसों में अपेक्षाकृत कम सक्रिय दिखाई दिए। दोनों के बीच सदन में बातचीत और हल्की मुस्कान के दृश्य भी चर्चा का हिस्सा बने।
यह स्थिति खास तौर पर उस समय सामने आई जब विधानसभा में कांग्रेस विधायक यशवंतारायगौड़ा पाटिल के इस्तीफे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई।

यशवंतारायगौड़ा पाटिल के इस्तीफे पर BJP का तंज
यशवंतारायगौड़ा पाटिल के इस्तीफे का मुद्दा विधानसभा में विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का अवसर बना। पाटिल ने सूखे से जुड़े मुद्दे पर इस्तीफा दिया था। यह उनका दो महीने में दूसरी बार इस्तीफा था। इससे पहले भी उन्होंने इस्तीफा दिया था, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया था।
इसी बहस के दौरान विधानसभा में BJP के उपनेता अरविंद बेल्लद ने सिद्धारमैया की चुप्पी पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इन घटनाक्रमों को देखकर सबसे ज्यादा आनंद सिद्धारमैया उठा रहे हैं और वे बिना कुछ कहे सब कुछ देख रहे हैं।
बेल्लद की टिप्पणी पर सिद्धारमैया ने कोई जवाब नहीं दिया। वे अपनी सीट पर मुस्कुराते हुए दिखाई दिए। इसके बाद उनकी खामोशी विधानसभा के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का एक और विषय बन गई।
कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चा
सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कर्नाटक कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में नेतृत्व को लेकर चर्चाएं लगातार होती रही हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और सिद्धारमैया दोनों कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।
हाल के हफ्तों में सिद्धारमैया ने पार्टी की बैठकों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। सितंबर की शुरुआत में उनके AHINDA—पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और दलितों से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक आधार—को फिर से सक्रिय करने की गतिविधियों की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
ऐसे में विधानसभा में उनकी अपेक्षाकृत कम सक्रियता और अन्य राजनीतिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी के बीच अंतर भी राजनीतिक चर्चा का कारण बन रहा है।
क्या है चुप्पी की वजह?
सिद्धारमैया के मौजूदा रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। कुछ लोग इसे मुख्यमंत्री पद से जुड़े हालिया घटनाक्रम और उनके करीबी नेताओं की राजनीतिक स्थिति से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं, कुछ अन्य लोग मानते हैं कि उनकी विधानसभा में सीमित भागीदारी के पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
हालांकि, इन व्याख्याओं की पुष्टि सिद्धारमैया की ओर से नहीं की गई है। इसलिए उनके मौजूदा रुख के पीछे किसी निश्चित राजनीतिक रणनीति या कारण का निष्कर्ष निकालना फिलहाल उचित नहीं होगा।
विधानसभा में मुद्दे फिर भी गरम
सिद्धारमैया की चुप्पी के बीच कर्नाटक विधानसभा में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी बहस जारी है। सूखे को लेकर विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सरकार केंद्र से राहत और सूखा प्रबंधन के लिए सहायता की मांग कर रही है।
दूसरी ओर, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर विधानसभा का रुख भी महत्वपूर्ण रहा है। राज्य सरकार ने रिपोर्ट के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करने के बजाय भौतिक सर्वेक्षण और पुनर्विचार की मांग की है। रिपोर्ट से जुड़े प्रस्ताव में पश्चिमी घाट के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के हितों के बीच संतुलन का मुद्दा प्रमुख रहा।
इन सभी घटनाक्रमों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री का सदन में मौजूद रहना, लेकिन बहस में अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप करना, राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
फिलहाल सिद्धारमैया विधानसभा में मौजूद हैं, पार्टी कार्यक्रमों में भी सक्रिय हैं, लेकिन सदन में उनके पहले वाले मुखर अंदाज की कमी साफ तौर पर चर्चा में है। उनकी ओर से इस बदलाव पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है। इसलिए उनकी चुप्पी को लेकर चल रही चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।











