मिडिल ईस्ट तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का दबाव बना हुआ है। Nomura की रिपोर्ट के अनुसार निफ्टी और सेंसेक्स में निकट भविष्य में करीब 5 प्रतिशत तक और गिरावट आ सकती है।
Stock Market: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच संघर्ष के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट आई है और निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
इसी बीच जापान की ब्रोकरेज फर्म Nomura ने अपनी नई रिपोर्ट में संकेत दिया है कि निकट भविष्य में भारतीय बाजार में करीब 5 प्रतिशत तक और गिरावट देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा वैश्विक हालात और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार पर दबाव बनाए रख सकती हैं।
भारतीय बाजार का मार्केट कैप घटा
मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू होने के बाद से भारतीय शेयर बाजार का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन तेजी से घटा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के बाजार का मार्केट कैप करीब 447 अरब डॉलर कम होकर लगभग 4.7 ट्रिलियन डॉलर रह गया है। इस तरह की तेज गिरावट इससे पहले मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान देखी गई थी।
उस समय भी वैश्विक अनिश्चितता के कारण बाजारों में भारी बिकवाली हुई थी। वैश्विक स्तर पर भी शेयर बाजारों में गिरावट का माहौल बना हुआ है और दुनिया के बाजारों का कुल मार्केट कैप करीब 8.5 ट्रिलियन डॉलर घटकर लगभग 148.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह गिरावट दिखाती है कि निवेशकों के बीच आर्थिक अनिश्चितता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
नोमुरा ने निफ्टी का लक्ष्य घटाया
ब्रोकरेज फर्म Nomura ने दिसंबर 2026 के लिए निफ्टी-50 का अपना लक्ष्य 15 प्रतिशत घटाकर 24,900 कर दिया है। इससे पहले ब्रोकरेज ने निफ्टी के लिए 29,300 का लक्ष्य रखा था। रिपोर्ट में कहा गया है कि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण कंपनियों की कमाई के अनुमान पर खतरा बढ़ गया है। अगर वैश्विक हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण रहते हैं और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है। इसी संभावना को देखते हुए निफ्टी के लक्ष्य में कटौती की गई है।
कंपनियों की कमाई पर दबाव का जोखिम
Nomura की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कंपनियों की कमाई के अनुमान में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट का जोखिम बन सकता है। हालांकि मौजूदा बेस केस अनुमान के अनुसार कंपनियों की कमाई में लगभग 7.5 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इसके अलावा ब्रोकरेज ने बाजार के Price to Earnings Ratio (P/E Ratio) के अनुमान को भी घटा दिया है। पहले इसे 21 गुना माना गया था, जिसे अब लगभग 18.5 गुना कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में बाजार की वैल्यूएशन पहले की तुलना में कम हो सकती है।
निफ्टी के लिए संभावित दायरा
ब्रोकरेज के अनुसार दिसंबर 2026 तक निफ्टी का संभावित दायरा 21,000 से 29,100 के बीच रह सकता है। यह अनुमान अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। बेहतर स्थिति में यह माना गया है कि वैश्विक राजनीतिक तनाव जल्दी कम हो जाएगा और आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो जाएंगी। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट का संघर्ष लंबा चलता है और ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
दो हफ्तों में 8 प्रतिशत टूटा बाजार
पिछले दो हफ्तों में भारतीय शेयर बाजार में लगभग 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। निफ्टी और निफ्टी बैंक दोनों अपने रिकॉर्ड हाई स्तर से करीब 13 प्रतिशत नीचे आ चुके हैं। इससे पहले इतनी तेज गिरावट केवल दो बार देखी गई थी। पहली बार 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान और दूसरी बार 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के समय।
पिछले सप्ताह भी भारतीय बाजार ने कई वर्षों की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की। 9 मार्च से 13 मार्च के बीच सेंसेक्स और निफ्टी में भारी बिकवाली देखी गई, जिसकी मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी रही।
कच्चे तेल की कीमतों से बढ़ी चिंता
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। यह भारत जैसे देशों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं और बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
स्मॉल और मिडकैप शेयरों में ज्यादा जोखिम
Nomura की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर बाजार में गिरावट जारी रहती है तो स्मॉल कैप और मिडकैप शेयरों में ज्यादा दबाव देखने को मिल सकता है। इन शेयरों की वैल्यूएशन पहले से काफी ऊंची रही है, इसलिए गिरावट के समय इनमें तेजी से करेक्शन आ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर Foreign Institutional Investors (FIIs) की ओर से निवेश कम होता है या वे बाजार से पैसा निकालते हैं तो शॉर्ट टर्म में बाजार और नीचे जा सकता है।









