चीनी की कीमतों को लेकर आम लोगों को अभी भी राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। चीनी मिलों से निकलने के बाद इसके दाम में काफी गिरावट आ चुकी है, लेकिन खुदरा बाजार और दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते इसकी कीमत बढ़ जाती है।
बिजनेस न्यूज़: चीनी की कीमतों में मिल स्तर पर बड़ी गिरावट आने के बावजूद इसका फायदा आम उपभोक्ताओं को खुदरा बाजार में पूरी तरह नहीं मिल रहा है। चीनी मिलों से निकलने वाली कीमत यानी एक्स-मिल प्राइस में करीब 30 फीसदी तक कमी बताई जा रही है, लेकिन कई बाजारों में ग्राहकों को अब भी चीनी के लिए 60 से 65 रुपये प्रति किलो तक चुकाने पड़ रहे हैं। इससे मिल कीमत और खुदरा कीमत के बीच अंतर को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ समय पहले चीनी की एक्स-मिल कीमत करीब 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी। अब इसमें गिरावट के बाद यह कीमत लगभग 47 रुपये प्रति किलो के आसपास बताई जा रही है। इसके बावजूद खुदरा बाजार में कीमत 60 रुपये से ऊपर बनी हुई है। चीनी उद्योग का कहना है कि जब मिल स्तर पर कीमत इतनी नीचे आ चुकी है, तो खुदरा बाजार में भी इसका असर दिखाई देना चाहिए।
क्या होती है एक्स-मिल कीमत?
एक्स-मिल कीमत वह दर होती है जिस पर चीनी मिल से बाहर निकलते समय थोक खरीदार या कारोबारी चीनी खरीदते हैं। यह अंतिम उपभोक्ता कीमत नहीं होती। मिल से निकलने के बाद उत्पाद की कीमत में परिवहन, भंडारण, थोक कारोबारी का मार्जिन और खुदरा विक्रेता का मार्जिन जैसे खर्च शामिल हो सकते हैं।
यही वजह है कि एक्स-मिल कीमत में गिरावट आने के तुरंत बाद दुकानों पर चीनी उसी अनुपात में सस्ती हो जाए, यह जरूरी नहीं है। हालांकि, मौजूदा स्थिति में उद्योग का कहना है कि मिल और खुदरा कीमतों के बीच अंतर सामान्य स्तर से अधिक दिखाई दे रहा है।
चीनी मिलों ने क्यों उठाए सवाल?
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चीनी उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, बाजार में फिलहाल चीनी की उपलब्धता को लेकर कोई बड़ी कमी नहीं है। उत्पादन और सप्लाई पर्याप्त रहने के बावजूद यदि उपभोक्ताओं को 60-65 रुपये प्रति किलो का भुगतान करना पड़ रहा है, तो इसका कारण केवल मिल स्तर की कीमत नहीं हो सकता। उद्योग का मानना है कि एक्स-मिल कीमत में हुई तेज गिरावट का फायदा धीरे-धीरे थोक और खुदरा बाजार तक पहुंचना चाहिए। हालांकि, खुदरा कीमतों में बदलाव में कुछ समय लग सकता है।
पुराने स्टॉक का भी पड़ सकता है असर
खुदरा बाजार में चीनी की कीमत तुरंत कम न होने की एक वजह पुराना स्टॉक भी हो सकता है। कारोबारियों ने यदि पहले चीनी अधिक कीमत पर खरीदी है, तो वे मौजूदा कीमतों में गिरावट के बावजूद पुराने माल को लागत के हिसाब से बेच सकते हैं। जब बाजार में कम कीमत पर खरीदा गया नया स्टॉक पहुंचने लगेगा, तब खुदरा कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, वास्तविक कीमतों में कितनी और कब गिरावट आएगी, यह बाजार की सप्लाई और कारोबारी लागत पर निर्भर करेगा।
सरकार ने कीमत नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए?
चीनी की कीमतों में तेजी को नियंत्रित करने और घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार ने भी कई कदम उठाए हैं। इनमें 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देना और बाजार में जमाखोरी पर निगरानी बढ़ाना शामिल है। इसके अलावा थोक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा तय की गई है, ताकि बड़ी मात्रा में चीनी जमा करके बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की संभावना को कम किया जा सके।









