उदयनिधि स्टालिन के ‘सनातन खत्म’ बयान पर नया विवाद: सफाई के बाद भी राजनीतिक और कानूनी बहस तेज

उदयानिधि स्टालिन ने सनातन धर्म बयान पर सफाई दी, कहा यह जाति भेदभाव के खिलाफ है, Madras High Court और Supreme Court of India की टिप्पणियो के बाद विवाद फिर तेज।

उदयनिधि स्टालिन ने सनातन टिप्पणी पर सफाई देते हुए कहा कि उनका विरोध जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ है और मंदिर जाने के खिलाफ नहीं है। मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद विवाद फिर तेज हो गया।

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर Udhayanidhi Stalin के पुराने और हालिया बयानों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। “सनातन धर्म खत्म किया जाना चाहिए” जैसे उनके बयान के बाद उठे राजनीतिक तूफान पर अब उन्होंने सफाई देते हुए कहा है कि उनके शब्दों को गलत तरीके से समझा जा रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था से है जो जाति के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती है। हालांकि, उनके बयान पर राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक स्तर पर बहस लगातार जारी है।

विवाद की शुरुआत: ‘सनातन धर्म’ पर बयान

12 मई को तमिलनाडु विधानसभा में दिए गए एक बयान में उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि “सनातन धर्म को समाप्त किया जाना चाहिए क्योंकि यह समाज को विभाजित करता है।” इस बयान के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने इस मुद्दे पर विवादित टिप्पणी की हो। इससे पहले 2023 में उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की थी, जिससे राजनीतिक विवाद और तेज हो गया था।

सफाई में क्या कहा उदयनिधि स्टालिन ने?

हालिया बयान पर बढ़ते विवाद के बाद उदयनिधि स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी स्थिति स्पष्ट की।

उन्होंने कहा कि उनके बयान का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं था। उनका कहना था कि वह मंदिर जाने या पूजा-पाठ के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उस सोच के खिलाफ हैं जो समाज में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देती है।

उन्होंने यह भी कहा कि उनका विचार द्रविड़ आंदोलन की उस परंपरा से जुड़ा है जो सामाजिक समानता और जाति-विरोधी विचारों को आगे बढ़ाती है।

द्रविड़ आंदोलन और वैचारिक पृष्ठभूमि

उदयनिधि स्टालिन ने अपने बयान का आधार तमिलनाडु के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास से जोड़ा। उन्होंने कहा कि उनके विचार Periyar E. V. Ramasamy, B. R. Ambedkar, C. N. Annadurai और M. Karunanidhi जैसे नेताओं की विचारधारा से प्रभावित हैं।

द्रविड़ आंदोलन लंबे समय से जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ सामाजिक सुधार की वकालत करता रहा है। उदयनिधि का कहना है कि उनका उद्देश्य इसी सामाजिक समानता के विचार को आगे बढ़ाना है।

2023 के बयान से बढ़ा विवाद

2 सितंबर 2023 को एक कार्यक्रम के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना मच्छर जनित बीमारियों जैसे डेंगू, मलेरिया और कोविड-19 से की थी। उस समय भी उनके बयान को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे।

उन्होंने बाद में स्पष्ट किया था कि वह हिंदू धर्म नहीं, बल्कि “सनातन प्रथा” के विरोध में हैं। उनके अनुसार यह एक सामाजिक संरचना है जिसे वे असमानता का प्रतीक मानते हैं।

कानूनी और न्यायिक टिप्पणियां

इस मामले ने न्यायपालिका का भी ध्यान खींचा है। मद्रास उच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके बयान हेट स्पीच की श्रेणी में आ सकते हैं। अदालत ने कहा कि “सनातन को खत्म करने” जैसे शब्द केवल विरोध नहीं, बल्कि किसी विचारधारा को पूरी तरह समाप्त करने की मानसिकता दर्शाते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे बयान समाज में विभाजन और तनाव को बढ़ा सकते हैं, इसलिए इन्हें गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इस विवाद पर Supreme Court of India ने भी पहले टिप्पणी की थी। मार्च 2025 में अदालत ने कहा था कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों को अपने बयानों के प्रभावों को समझना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी माना कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे बयान न दें जो सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकते हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और बहस

उदयनिधि स्टालिन के बयान पर भारत की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपनाया है।

एक पक्ष इसे सामाजिक सुधार और जाति-विरोधी विचारधारा से जोड़कर देखता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बयान मानता है।

इस बहस ने भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक संवेदनशीलता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है।

‘सनातन’ बनाम सामाजिक सुधार की बहस

यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में लंबे समय से चली आ रही वैचारिक बहस का हिस्सा भी है।

एक ओर कुछ विचारक मानते हैं कि समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव और असमानता को समाप्त करने के लिए कठोर सामाजिक सुधार जरूरी हैं, वहीं दूसरी ओर कई समूह मानते हैं कि किसी भी धार्मिक परंपरा को खत्म करने की भाषा समाज में तनाव बढ़ा सकती है।

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