सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि उसने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग के संशोधित फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही इस पर कोई फैसला सुनाया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किए जा रहे संशोधित फॉर्म 6 को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि उसने न तो इस फॉर्म को मंजूरी दी है और न ही इसे खारिज किया है। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित मामले में फैसला सुनाते समय संशोधित फॉर्म 6 अदालत के सामने विचार के लिए मौजूद नहीं था।
शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग के उस दावे पर सवाल उठे हैं, जिसमें संशोधित घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति मिलने की बात कही गई थी। यह मामला मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के अधिकारों और चुनावी नियमों में बदलाव से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के कारण चर्चा में है।
संशोधित फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि संशोधित फॉर्म 6 पर अदालत ने कोई न्यायिक निर्णय नहीं दिया है। पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फॉर्म में किए गए बदलावों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि अदालत पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि संशोधित फॉर्म को उसकी मंजूरी प्राप्त नहीं है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में फैसला सुनाए जाने के समय संशोधित फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी पिछली टिप्पणियों को फॉर्म की मंजूरी या अस्वीकृति के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया रिपोर्टिंग में सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि टिप्पणियों के चुनिंदा हिस्सों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए।
चुनाव आयोग के दावे पर क्यों उठा विवाद?

फॉर्म 6 को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञप्ति में संकेत दिया गया था कि बिहार एसआईआर से संबंधित मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित घोषणा-पत्र को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत के ताजा स्पष्टीकरण के अनुसार, संबंधित फैसले के समय संशोधित फॉर्म उसके विचाराधीन नहीं था। ऐसे में उस फैसले को संशोधित घोषणा-पत्र पर न्यायिक मंजूरी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
इस घटनाक्रम ने चुनाव आयोग के दावे और अदालत के वास्तविक न्यायिक रुख के बीच अंतर को सामने ला दिया है। हालांकि, संशोधित फॉर्म की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित नियमों, आधिकारिक दस्तावेजों और आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही को देखना जरूरी होगा।
संशोधित फॉर्म 6 में क्या बदलाव किया गया है?
फॉर्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। संशोधित प्रारूप के तहत आवेदन करने वाले व्यक्ति को यह जानकारी देनी होती है कि वह या उसके माता-पिता पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण में शामिल थे या नहीं। इससे पहले कुछ राज्यों में एसआईआर के दौरान इस्तेमाल किए गए फॉर्म 6 के पुराने प्रारूप में ऐसी शर्त शामिल नहीं थी। नए प्रावधान के कारण मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में अतिरिक्त जानकारी देना जरूरी हो गया है।
इस बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस तरह की शर्त लागू करने के लिए मौजूदा नियमों में औपचारिक संशोधन आवश्यक था। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया का सीधा संबंध नागरिकों के मतदान के अधिकार से है।
मतदाता पंजीकरण नियमों में संशोधन को लेकर भी सवाल
रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर भी संशोधित घोषणा-पत्र को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं। कथित तौर पर दो चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाया था कि केंद्र सरकार की ओर से मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में आवश्यक संशोधन किए बिना घोषणा-पत्र में बदलाव करना उचित है या नहीं। यह मुद्दा चुनावी प्रशासन की प्रक्रिया और आयोग के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। हालांकि, इन आपत्तियों और उनके कानूनी प्रभाव का आकलन संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए।









