अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों का टेम्पररी प्रोटेक्टेड स्टेटस (TPS) खत्म करने की अनुमति दे दी। अदालत ने सीमा पर अमेरिकी जमीन पर पहुंचे बिना शरण आवेदन स्वीकार न करने के फैसले को भी बरकरार रखा।
वॉशिंगटन: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन को हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों को दिए गए टेम्पररी प्रोटेक्टेड स्टेटस (TPS) को समाप्त करने की अनुमति दे दी है। इस फैसले के साथ ही ट्रम्प प्रशासन को लंबे समय से अमेरिका में रह रहे लाखों प्रवासियों की कानूनी सुरक्षा समाप्त करने का रास्ता मिल गया है।
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर पहुंचने वाले प्रवासी तब तक शरण (Asylum) के लिए आवेदन नहीं कर सकते, जब तक वे अमेरिकी भूमि पर शारीरिक रूप से प्रवेश नहीं कर लेते। इन दोनों फैसलों को ट्रम्प प्रशासन की आव्रजन नीति के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है।
किन प्रवासियों पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर
सुप्रीम कोर्ट के 6-3 के बहुमत वाले फैसले ने निचली अदालतों के उन आदेशों को पलट दिया, जिन्होंने ट्रम्प प्रशासन को TPS समाप्त करने से रोक रखा था। इस निर्णय से लगभग 3.5 लाख हैती के नागरिक और 6,100 सीरियाई नागरिक सीधे प्रभावित होंगे। इन लोगों को वर्षों पहले मानवीय आधार पर अमेरिका में रहने और काम करने की अनुमति दी गई थी। अब यदि प्रशासन आगे आवश्यक प्रक्रिया पूरी करता है, तो इन प्रवासियों की कानूनी सुरक्षा समाप्त हो सकती है और भविष्य में उन्हें निर्वासन (Deportation) का सामना करना पड़ सकता है।
क्या होता है Temporary Protected Status (TPS)?
टेम्पररी प्रोटेक्टेड स्टेटस (TPS) अमेरिका की एक विशेष मानवीय व्यवस्था है, जिसके तहत उन देशों के नागरिकों को अस्थायी सुरक्षा दी जाती है, जहां युद्ध, प्राकृतिक आपदा या अन्य गंभीर संकट के कारण सुरक्षित वापसी संभव नहीं होती।
TPS प्राप्त व्यक्ति निर्धारित अवधि तक अमेरिका में कानूनी रूप से रह सकते हैं, काम कर सकते हैं और केवल उनके आव्रजन दर्जे के आधार पर उन्हें हिरासत में नहीं लिया जा सकता। हालांकि यह स्थायी नागरिकता या ग्रीन कार्ड का अधिकार नहीं देता। अमेरिका ने वर्ष 2010 में विनाशकारी भूकंप के बाद हैती के नागरिकों को TPS प्रदान किया था, जबकि 2012 में सीरिया में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद वहां के नागरिकों को यह सुरक्षा दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
बहुमत की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायाधीश सैमुअल एलिटो ने कहा कि TPS से संबंधित अमेरिकी कानून सरकार के प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा की सीमित अनुमति देता है। उनके अनुसार यह मामला कानूनी रूप से स्पष्ट है और अदालत को प्रशासनिक नीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
एलिटो ने यह भी कहा कि हैती के प्रवासियों द्वारा लगाए गए नस्लीय भेदभाव के आरोप अदालत में सफल होने की संभावना कम है। उन्होंने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह साबित करना कठिन होगा कि प्रशासन ने केवल नस्लीय कारणों से TPS समाप्त करने का निर्णय लिया।
तीन न्यायाधीशों ने जताई असहमति
सुप्रीम कोर्ट के तीन उदारवादी (Liberal) न्यायाधीशों ने इस फैसले से असहमति जताई। न्यायाधीश एलेना केगन ने कहा कि प्रशासन के फैसले में नस्लीय पूर्वाग्रह के संकेत दिखाई देते हैं। उनके अनुसार राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयानों और निर्णयों से यह आशंका पैदा होती है कि हैती के प्रवासियों के प्रति अलग दृष्टिकोण अपनाया गया।
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वहीं न्यायाधीश सोनिया सोटोमयोर ने दूसरे फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि सीमा पर शरण लेने की प्रक्रिया को सीमित करने से अधिक लोग अवैध रास्तों से सीमा पार करने का प्रयास करेंगे, जिससे मानवीय संकट और बढ़ सकता है।
ट्रम्प प्रशासन ने फैसले का किया स्वागत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security) ने इसे कानून के शासन की जीत बताया। विभाग के जनरल काउंसिल जेम्स पर्सिवल ने कहा कि TPS का अर्थ ही "अस्थायी सुरक्षा" है, लेकिन समय के साथ कई मामलों में यह व्यवस्था स्थायी राहत जैसी बन गई थी। उनके अनुसार अदालत के फैसले से कानून की मूल भावना बहाल हुई है। ट्रम्प प्रशासन लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि TPS का उद्देश्य केवल अस्थायी राहत देना है, न कि स्थायी रूप से अमेरिका में रहने का अधिकार।
मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता
मानवाधिकार संगठनों और प्रवासी अधिकार समूहों ने इस फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। पब्लिक राइट्स प्रोजेक्ट की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिल हैबिग ने कहा कि इस निर्णय से लाखों लोगों का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा। उनके अनुसार बड़ी संख्या में परिवार अलग हो सकते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और लोगों को ऐसे देशों में लौटना पड़ सकता है, जहां अभी भी हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट बना हुआ है उन्होंने कहा कि इस फैसले का प्रभाव केवल प्रभावित प्रवासियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिका के कई शहरों और स्थानीय समुदायों पर भी इसका असर पड़ेगा।
शरण नीति पर भी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में भी ट्रम्प प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर मौजूद व्यक्ति तब तक शरण के लिए आवेदन करने का अधिकार नहीं रखता, जब तक वह अमेरिकी क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर लेता।
ट्रम्प प्रशासन का तर्क था कि केवल सीमा चौकी तक पहुंच जाना अमेरिका में "आगमन" नहीं माना जा सकता। इसलिए सीमा के मैक्सिको वाले हिस्से में मौजूद लोग अमेरिकी शरण कानून के तहत आवेदन करने के पात्र नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को स्वीकार करते हुए प्रशासन की नीति को कानूनी मान्यता दे दी।
2016 की नीति फिर होगी लागू
यह फैसला ट्रम्प प्रशासन को 2016 में शुरू की गई "मीटरिंग" नीति दोबारा लागू करने की अनुमति देता है। इस नीति के तहत सीमा अधिकारियों को प्रतिदिन सीमित संख्या में शरण आवेदनों को स्वीकार करने का अधिकार मिलता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य सीमा चौकियों पर अत्यधिक भीड़ और संसाधनों पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित करना बताया गया था। बाद में 2021 में राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में इस नीति को समाप्त कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रम्प प्रशासन इस व्यवस्था को फिर से लागू कर सकता है।
वैश्विक स्तर पर क्या हो सकते हैं प्रभाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल हैती और सीरिया के नागरिकों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे उन अन्य देशों के TPS धारकों पर भी प्रभाव पड़ सकता है, जिन्हें भविष्य में इसी प्रकार की कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा यह निर्णय अमेरिकी आव्रजन नीति में कार्यपालिका की शक्तियों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इससे शरणार्थियों और अस्थायी सुरक्षा प्राप्त प्रवासियों के अधिकारों पर व्यापक बहस शुरू हो सकती है।








