अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत से आने वाले उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया, लेकिन भारतीय निर्यातकों ने कीमतें नहीं घटाईं। परिणामस्वरूप अमेरिकी खरीदारों ने पूरा बोझ उठाया, जबकि निर्यात की मात्रा 18-24% तक घट गई।
US Tariffs: अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत से आने वाले कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगा दिया। शुरुआत में 7 अगस्त को 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया और 27 अगस्त को इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया। माना जा रहा था कि इतनी बड़ी दर से भारतीय निर्यातक दबाव में आएंगे और कीमतें घटा देंगे। लेकिन वास्तविकता इससे अलग रही। भारतीय निर्यातकों ने अपने दाम जस के तस रखे और घाटा उठाने की बजाय अमेरिका को भेजी जाने वाली खेप की मात्रा कम कर दी।
अमेरिकी बाजार में खेप में कमी, कीमत नहीं बदली
जर्मनी के कील इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी (Kiel Institute of World Economics) की नई रिसर्च बताती है कि अमेरिका जाने वाला भारतीय निर्यात 18 से 24 प्रतिशत तक घट गया। लेकिन यह भी पाया गया कि यूरोप, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य बाजारों में भारतीय निर्यात पर टैरिफ का कोई असर नहीं पड़ा।
रिसर्च में सबसे महत्वपूर्ण सुराग कीमतों से मिला। अगर भारतीय निर्यातक टैरिफ का बोझ खुद उठा रहे होते, तो अमेरिका भेजे गए सामान के दाम दूसरे देशों की तुलना में गिर जाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका और यूरोप, कनाडा व ऑस्ट्रेलिया को भेजे गए भारतीय सामान के दाम लगभग समान रहे। इसका साफ मतलब है कि टैरिफ की कीमत अमेरिकी खरीदारों ने चुकाई।
निर्यात पर कुल असर
हालांकि भारतीय निर्यातकों के लिए यह राहत देने वाली तस्वीर पूरी नहीं है। दिसंबर 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात साल दर साल 1.83 प्रतिशत घटकर 6.88 अरब डॉलर रह गया। सबसे अधिक नुकसान जेम्स और ज्वैलरी सेक्टर को हुआ, जहां अप्रैल से दिसंबर के बीच निर्यात 44 प्रतिशत से ज्यादा गिरा।
वैश्विक आंकड़ों ने दिखाया असली असर
कील इंस्टीट्यूट ने जनवरी 2024 से नवंबर 2025 के बीच दुनिया भर के 2.5 करोड़ से अधिक व्यापारिक सौदों और करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के कारोबार का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि वैश्विक स्तर पर लगाए गए टैरिफ का सिर्फ 4 प्रतिशत बोझ निर्यातकों ने झेला, जबकि 96 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों की जेब से चुका।
रिपोर्ट में साफ कहा गया कि टैरिफ से कीमतें नहीं बदलीं, बल्कि व्यापार की मात्रा घट गई। यह दिखाता है कि टैरिफ का असली बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं ने उठाया, न कि भारतीय निर्यातकों ने।
क्यों नहीं घटाई कीमतें भारतीय कंपनियों ने
संस्थान के मुताबिक, भारतीय निर्यातकों ने पीछे हटने की बजाय अपनी रणनीति बदल दी। भारत ने उन सामानों के लिए अन्य बाजार खोज लिए, जो अमेरिका में महंगे हो गए थे।
इसके अलावा, 50 प्रतिशत टैरिफ के दबाव को खत्म करने के लिए कीमतों में करीब 33 प्रतिशत कटौती करनी पड़ती, जिससे निर्यातकों को सीधा नुकसान होता। अमेरिकी आयातकों के कई पुराने विदेशी सप्लायरों से व्यापारिक संबंध भी हैं, जिन्हें बदलना आसान नहीं है।
सप्लाई चेन पर असर
टैरिफ से व्यापार की मात्रा घटने के कारण सप्लाई चेन पर भारी दबाव पड़ा। भारतीय कंपनियों ने दाम नहीं घटाए, लेकिन अमेरिका को भेजे जाने वाले माल की खेप कम कर दी। इसका मतलब है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को सामान महंगा पड़ा और सप्लाई बाधित हुई।
अमेरिकी टैरिफ नीति का असली सच
कील इंस्टीट्यूट ने निष्कर्ष निकाला कि अमेरिकी टैरिफ असल में अमेरिकी जनता पर लगाया गया टैक्स है। यह दावा कि विदेशी देश या निर्यातक टैरिफ चुकाते हैं, आंकड़ों से पूरी तरह साबित नहीं होता। टैरिफ से व्यापार की मात्रा प्रभावित होती है, कीमतें नहीं बदलतीं। इसके अलावा, सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ता है और अमेरिकी उपभोक्ता को ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है।












