उत्तराखंड और ओडिशा के बीच वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक अहम पहल सामने आई है। उत्तराखंड के रामनगर स्थित रेस्क्यू सेंटर से दो बाघ ओडिशा भेजे जाने की तैयारी है। इन बाघों को ओडिशा के बारंग स्थित चिड़ियाघर में रखा जाएगा, जहां उनके लिए नई टेरेटरी तैयार की जाएगी। बताया जा रहा है कि अभी रामनगर के ढेला रेंज स्थित रेस्क्यू सेंटर में करीब 16 बाघ रह रहे हैं। ऐसे में दो बाघों को दूसरे राज्य भेजे जाने से रेस्क्यू सेंटर पर भी दबाव कम होगा और ओडिशा में बाघों के संरक्षण कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी।
रामनगर और कॉर्बेट क्षेत्र बाघों की मौजूदगी के लिए देशभर में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहां वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से बाघों के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े मामलों पर काम करते रहे हैं। कॉर्बेट क्षेत्र में रेस्क्यू और पुनर्वास की सुविधाएं भी विकसित की गई हैं। आधिकारिक कॉर्बेट वेबसाइट के अनुसार क्षेत्र में प्रशिक्षित विशेषज्ञों और आधुनिक सुविधाओं के जरिए वन्यजीवों के रेस्क्यू और पुनर्वास का काम किया जाता है।
ढेला रेंज में स्थित रेस्क्यू सेंटर में ऐसे बाघों को रखा जाता है, जिन्हें किसी कारण से जंगल में वापस छोड़ना संभव नहीं होता या जिन्हें उपचार और निगरानी की जरूरत होती है। यहां उनकी देखभाल, स्वास्थ्य जांच और व्यवहार पर नजर रखी जाती है। उपलब्ध राष्ट्रीय बाघ मृत्यु रिकॉर्ड में भी जनवरी 2026 में ढेला रेंज के रेस्क्यू सेंटर में एक वयस्क मादा बाघ की मौत का रिकॉर्ड दर्ज है, जिससे इस क्षेत्र में रेस्क्यू किए गए बाघों की मौजूदगी की पुष्टि होती है।
अब उत्तराखंड से दो बाघों को ओडिशा भेजने की योजना को दोनों राज्यों के बीच वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बाघों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने की प्रक्रिया सामान्य परिवहन जैसी नहीं होती। इसमें बाघों की स्वास्थ्य स्थिति, उम्र, व्यवहार, आनुवंशिक स्थिति और नए वातावरण में अनुकूलन की क्षमता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
ओडिशा में बाघ संरक्षण को लेकर पहले से कई प्रयास चल रहे हैं। खासकर सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में बाघों की आबादी और आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के लिए टाइगर सप्लीमेंटेशन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक ओडिशा वन्यजीव विभाग ने इस कार्यक्रम के दूसरे चरण में एक नर और एक मादा बाघ को सिमिलिपाल लाने की योजना बनाई थी।
सिमिलिपाल में बाघों के संरक्षण की यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां की बाघ आबादी में लंबे समय से आनुवंशिक विविधता को लेकर चिंता रही है। महाराष्ट्र से लाई गई बाघिन जीनत के सिमिलिपाल में चार शावकों को जन्म देने को वन्यजीव अधिकारियों ने संरक्षण कार्यक्रम की बड़ी सफलता माना था। इससे वहां नए जीन पूल को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जगी।
हालांकि रामनगर से ओडिशा भेजे जाने वाले दोनों बाघों को बारंग जू में रखने की योजना बताई जा रही है। यानी यह स्थानांतरण सीधे किसी टाइगर रिजर्व में बाघों को जंगल में छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि नई टेरेटरी और प्रबंधन व्यवस्था के तहत रखने से जुड़ा है। बाघों को वहां किस उद्देश्य से रखा जाएगा, इसकी अंतिम व्यवस्था संबंधित वन्यजीव अधिकारियों और विशेषज्ञों की मंजूरी के अनुसार तय होगी।
बाघों को दूसरे राज्य में भेजने के दौरान उनके लिए विशेष परिवहन व्यवस्था की जाती है। यात्रा से पहले उनकी मेडिकल जांच की जाती है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे लंबी दूरी की यात्रा के लिए स्वस्थ हैं। इसके बाद विशेषज्ञों की निगरानी में उन्हें सुरक्षित तरीके से नए स्थान तक पहुंचाया जाता है।
रामनगर के रेस्क्यू सेंटर में मौजूद बाघों की संख्या को देखते हुए भी यह कदम महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर किसी रेस्क्यू सेंटर में लगातार नए बाघ आते रहें और पुराने बाघों को दूसरे उपयुक्त केंद्रों में स्थानांतरित न किया जाए तो जगह, भोजन और देखभाल की व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। दो बाघों के ओडिशा जाने से उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
दूसरी तरफ ओडिशा के लिए यह पहल बाघों की देखभाल और संरक्षण क्षमता को बढ़ाने का अवसर हो सकती है। बारंग में नई टेरेटरी मिलने से वहां बाघों के लिए अलग और नियंत्रित वातावरण तैयार किया जा सकेगा। ऐसे स्थानों पर बाघों के स्वास्थ्य, व्यवहार और भोजन से लेकर उनकी सुरक्षा तक की निगरानी विशेषज्ञों द्वारा की जाती है।
वन्यजीव संरक्षण में राज्यों के बीच इस तरह का सहयोग नया नहीं है। देश में अलग-अलग राज्यों के बीच बाघों के स्थानांतरण और संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम पहले भी चलाए जाते रहे हैं। इसका उद्देश्य जरूरत के मुताबिक बाघों की आबादी को सुरक्षित स्थान देना, आनुवंशिक विविधता बनाए रखना और रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों के लिए बेहतर प्रबंधन व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
बाघों के स्थानांतरण में आनुवंशिक विविधता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक सीमित संख्या में बाघों के बीच प्रजनन होता है तो आनुवंशिक विविधता प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से देश के कई टाइगर रिजर्व में वैज्ञानिक आधार पर बाघों की आवाजाही और पुनर्वास की योजनाएं बनाई जाती हैं।
ओडिशा में इस समय बाघ संरक्षण को लेकर गतिविधियां बढ़ी हुई हैं। सिमिलिपाल में टाइगर सप्लीमेंटेशन की दूसरी चरण की तैयारी और जीनत के चार शावकों का जन्म वहां चल रहे संरक्षण प्रयासों की दिशा को दिखाता है। अधिकारियों ने दूसरे चरण में एक नर और एक मादा बाघ लाने की योजना पर भी काम शुरू किया है।
ऐसे में उत्तराखंड से दो बाघों का ओडिशा जाना अलग संरक्षण परियोजना का हिस्सा होने के बावजूद राज्य की कुल वन्यजीव प्रबंधन व्यवस्था को मजबूती देने वाला कदम हो सकता है। हालांकि दोनों बाघों की सटीक पहचान, उनकी उम्र, लिंग और स्थानांतरण की तारीख जैसी जानकारी आधिकारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
स्थानीय स्तर पर भी बाघों के स्थानांतरण को लेकर लोगों की नजर बनी हुई है। रामनगर-कॉर्बेट क्षेत्र में बाघों को लेकर लोगों की विशेष रुचि रहती है। वहीं ओडिशा में भी वन्यजीव प्रेमियों के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है कि उत्तराखंड से आने वाले दोनों बाघों को बारंग में नई टेरेटरी मिलने वाली है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे जरूरी बात बाघों की सुरक्षा और कल्याण है। स्थानांतरण के दौरान तनाव कम करने, स्वास्थ्य की निगरानी करने और नए वातावरण में उन्हें धीरे-धीरे अनुकूल बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। विशेषज्ञों की निगरानी में ही बाघों को नई जगह पर रखा जाना अपेक्षित है।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड के रामनगर स्थित रेस्क्यू सेंटर से दो बाघों को ओडिशा भेजने की तैयारी है। दोनों को बारंग जू में नई टेरेटरी मिलेगी। अभी ढेला रेंज के रेस्क्यू सेंटर में करीब 16 बाघ बताए जा रहे हैं। यह कदम एक तरफ रामनगर के रेस्क्यू सेंटर में उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकता है, वहीं दूसरी ओर ओडिशा में बाघों के संरक्षण और देखभाल की व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है











