उत्तरकाशी में आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से महिलाओं और किशोरियों को उपलब्ध कराए जा रहे सैनिटरी पैड की कीमत और गुणवत्ता को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहले जिस सैनिटरी पैड को करीब छह रुपये में उपलब्ध कराया जाता था, उसकी कीमत अब बढ़ाकर 15 रुपये कर दी गई है। उनका दावा है कि कीमत बढ़ने के साथ पैड की गुणवत्ता को लेकर भी महिलाओं और किशोरियों में असंतोष है और कई लोग इसे खरीदने से इनकार कर रहे हैं। इस वजह से जिले के कई आंगनबाड़ी केंद्रों पर सैनिटरी पैड का स्टॉक जमा होने की बात सामने आई है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरकाशी जिले में महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को किशोरियों के लिए सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जा रहे हैं। आंगनबाड़ी संगठन की जिलाध्यक्ष विजयलक्ष्मी नौटियाल समेत अन्य कार्यकर्ताओं ने पैड की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पहले कम कीमत पर उपलब्ध होने के दौरान कुछ महिलाएं इन्हें खरीद लेती थीं, लेकिन अब कीमत 15 रुपये होने के बाद ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इनकी मांग काफी कम हो गई है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिक्री नहीं होने के कारण उन्हें इन पैड के स्टॉक का आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष में कुछ केंद्रों पर पहुंची पहली खेप का खर्च भी कार्यकर्ताओं को स्वयं वहन करना पड़ा। अब दूसरी खेप लेने से कुछ कार्यकर्ताओं ने इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि जब महिलाएं और किशोरियां उत्पाद खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं तो बिना मांग के स्टॉक उपलब्ध कराने का खर्च भी उन्हीं पर पड़ रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों के हवाले से बताया गया है कि उत्तरकाशी के एक हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों पर सैनिटरी पैड का स्टॉक बिक नहीं पा रहा है। कुछ कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि लंबे समय तक पड़े रहने से कुछ पैकेटों को नुकसान भी हुआ है। हालांकि स्टॉक की वास्तविक मात्रा, खराब हुए पैकेटों की संख्या और नुकसान की जिम्मेदारी को लेकर आधिकारिक विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल कीमत में बदलाव को लेकर उठ रहा है। आंगनबाड़ी संगठन की ओर से बताया गया है कि पहले पैड करीब छह रुपये में उपलब्ध कराया जाता था। अब इसकी कीमत 15 रुपये बताई जा रही है। यानी एक पैकेट की कीमत में नौ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्तर पर उठाए जा रहे सवालों में यह भी पूछा जा रहा है कि जब महिलाओं और किशोरियों के लिए सैनिटरी पैड की उपलब्धता बढ़ाने का उद्देश्य है, तो कीमत बढ़ने के बाद इसकी पहुंच और उपयोगिता पर क्या असर पड़ रहा है।
उत्तराखंड में पहले भी आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की व्यवस्था रही है। राज्यपाल सचिवालय की 2021 की जानकारी के अनुसार उस समय 'स्पर्श' सैनिटरी नैपकिन योजना के तहत एक सैनिटरी नैपकिन की कीमत छह रुपये निर्धारित थी। इसमें से एक रुपये आंगनबाड़ी कर्मियों को पारितोषिक के तौर पर और पांच रुपये विभागीय खाते में जमा किए जाने की व्यवस्था बताई गई थी। हालांकि वर्तमान में उपलब्ध कराए जा रहे 15 रुपये वाले उत्पाद की कीमत और पुराने छह रुपये वाले उत्पाद की तुलना में समान पैमाने पर क्या बदलाव हुआ है, यह स्पष्ट करने के लिए विभागीय रिकॉर्ड और खरीद प्रक्रिया की जानकारी जरूरी होगी।
वर्तमान विवाद में केवल कीमत ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता का मुद्दा भी सामने आया है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का दावा है कि महिलाओं और किशोरियों ने उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर संतुष्टि नहीं जताई है। यही कारण बताया जा रहा है कि कई जगह महिलाएं इन्हें खरीदने के बजाय बाजार में उपलब्ध दूसरे विकल्पों को प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि सैनिटरी पैड की गुणवत्ता से जुड़े इन आरोपों की स्वतंत्र प्रयोगशाला जांच या विभागीय गुणवत्ता रिपोर्ट इस समय सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे फिलहाल शिकायत और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सैनिटरी पैड केवल एक सामान्य उपभोक्ता उत्पाद नहीं है, बल्कि महिलाओं और किशोरियों की मासिक धर्म स्वच्छता से सीधे जुड़ा हुआ है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कम कीमत पर सैनिटरी उत्पाद उपलब्ध कराना सरकारी कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। यदि किसी उत्पाद की कीमत बढ़ती है या उसके इस्तेमाल को लेकर गुणवत्ता संबंधी शिकायतें सामने आती हैं तो इसका असर सीधे उन महिलाओं और किशोरियों पर पड़ सकता है जिन्हें नियमित रूप से इसकी जरूरत होती है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने इस मामले को लेकर महिला एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य को ज्ञापन भी दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक जिला कार्यक्रम अधिकारी यशोदा बिष्ट ने बताया कि कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे को मंत्री के सामने रखा है। उनके अनुसार मंत्री की ओर से राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत पैड मुफ्त वितरित करने के आदेश जारी किए जाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक ऐसे आदेश प्राप्त नहीं हुए थे।
दूसरी ओर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का एक और आरोप यह है कि उन्हें केवल पैड उपलब्ध कराने तक सीमित न रखकर उसकी बिक्री की जिम्मेदारी भी दी जा रही है। उनका कहना है कि यदि उत्पाद की मांग नहीं है और स्टॉक नहीं बिक रहा है तो उसका आर्थिक भार उनके ऊपर नहीं डाला जाना चाहिए। इस मुद्दे को लेकर कार्यकर्ताओं ने विभाग से स्पष्ट नीति बनाने और पुराने मूल्य तथा गुणवत्ता की व्यवस्था पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
मामले में कांग्रेस के जिला अध्यक्ष प्रदीप रावत ने भी खरीद प्रक्रिया की जांच की मांग उठाई है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार उन्होंने सवाल किया कि आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे पैड की कीमत 15 रुपये क्यों है, जबकि आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने वाले पैड की कीमत छह रुपये बताई जा रही है। यह अंतर किस आधार पर है, किस कंपनी या आपूर्तिकर्ता से खरीद की गई है और खरीद प्रक्रिया में किस दर को स्वीकृति दी गई, इन सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकेगा।
फिलहाल उत्तरकाशी में विवाद का केंद्र यही है कि महिलाओं और किशोरियों के लिए उपलब्ध कराए जा रहे सैनिटरी पैड की कीमत और गुणवत्ता को लेकर उठी शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। यदि गुणवत्ता पर आपत्ति है तो उत्पाद के नमूने लेकर प्रयोगशाला परीक्षण कराया जा सकता है और यदि कीमत पर सवाल हैं तो खरीद प्रक्रिया, निविदा, आपूर्ति दर और वितरण व्यवस्था की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। इससे यह भी पता चलेगा कि कीमत में वृद्धि किस कारण हुई और उसका आर्थिक बोझ किस स्तर पर पड़ रहा है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक महिलाओं को उत्पाद की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं होगा और कीमत उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगी, तब तक केंद्रों पर रखे स्टॉक की बिक्री मुश्किल बनी रहेगी। वहीं विभाग की ओर से यदि मुफ्त वितरण या नई वितरण व्यवस्था को लेकर कोई औपचारिक आदेश जारी होता है तो उससे वर्तमान स्थिति बदल सकती है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में विभागीय स्तर पर विस्तृत प्रतिक्रिया और गुणवत्ता जांच की अंतिम रिपोर्ट सामने नहीं आई है।
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी पहलू यह है कि सैनिटरी पैड की उपलब्धता बाधित न हो और महिलाओं तथा किशोरियों को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और उनकी पहुंच के भीतर कीमत पर मासिक धर्म स्वच्छता उत्पाद मिलते रहें। उत्तरकाशी जैसे पहाड़ी जिले में दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक ऐसे उत्पाद पहुंचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में यदि किसी योजना के तहत उपलब्ध कराए जा रहे उत्पाद का स्टॉक केंद्रों पर ही पड़ा रह जाए, तो योजना के उद्देश्य पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। अब निगाहें विभागीय जांच, खरीद प्रक्रिया की जानकारी और उत्पाद की गुणवत्ता संबंधी परीक्षण पर हैं।










