भारत में वन नेशन वन इलेक्शन (One Nation, One Election) विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इस विधेयक के लागू होने से संविधान के मूल ढांचे या संघवाद (Federalism) पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
नई दिल्ली: भारत के पूर्व चीफ जस्टिस (EX CJI) बी.आर. गवई ने वन नेशन वन इलेक्शन बिल का समर्थन किया है। उन्होंने गुरुवार को संयुक्त संसदीय समिति से कहा कि यह विधेयक न तो संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और न ही संघवाद या लोकतांत्रिक शासन की प्रणाली पर कोई नकारात्मक प्रभाव डालेगा। “एक देश, एक चुनाव” विधेयक भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनावों को एक ही समय पर आयोजित करने के उद्देश्य से पेश किया गया है।
वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक क्या है?
वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने की व्यवस्था लाने के लिए प्रस्तावित किया गया है। इस योजना के तहत संसद और राज्य विधानसभा के चुनाव एक ही चुनावी साइकिल में आयोजित किए जाएंगे, जिससे चुनाव प्रक्रिया सरल, प्रभावी और कम खर्चीली बनेगी।
पूर्व CJI बी.आर. गवई ने JPC के सामने कहा कि इसे लागू करने के लिए केवल चुनावी साइकिल में सुधार करना होगा और इससे किसी भी संवैधानिक प्रावधान को बदलने की जरूरत नहीं है। उनका कहना था कि इस विधेयक के लागू होने से संविधान के मूल ढांचे में कोई हानि नहीं होगी और न ही यह संघवाद या राज्यों के अधिकारों पर असर डालेगा।

JPC में जस्टिस गवई की राय
जानकारी के मुताबिक, बी.आर. गवई ने JPC में कहा कि विधेयक न केवल संवैधानिक रूप से वैध है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत भी करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधेयक लागू होने पर न ही संविधान के मूल ढांचे में कोई बदलाव होगा और न ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित होगी।
बैठक के बाद JPC के अध्यक्ष सांसद पी.पी. चौधरी ने कहा कि जस्टिस गवई ने इस विधेयक को बहुत बड़ा चुनाव सुधार करार दिया। उन्होंने बताया कि समिति के अधिकांश सदस्यों की प्रमुख चिंता विधेयक की संवैधानिक वैधता को लेकर थी।
अन्य पूर्व CJI की राय
अब तक भारत के छह पूर्व चीफ जस्टिस JPC के सामने इस 129वें संविधान संशोधन विधेयक, 2024 पर अपनी राय दे चुके हैं। जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.एस. केहर और जस्टिस बी.आर. गवई का मानना है कि यह विधेयक संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। वहीं, जस्टिस यू.यू. ललित और जस्टिस संजीव खन्ना ने विधेयक पर सवाल उठाते हुए केशवानंद भारती केस का हवाला दिया है।
उन्होंने कहा कि संविधान के मूल ढांचे पर प्रभाव की संभावना पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। पूर्व CJI बी.आर. गवई ने इस पर जोर देते हुए कहा कि विधेयक संसद की शक्ति के तहत है और इसे लागू करना लोकतंत्र में सुधार का एक कदम है।











