Badrinath Dham Yatra 2024: दिव्यांगों के लिए मिशाल साबित हुए सूरदास कृष्णपाल, भीख मंगवाने की बजाए बन गए कारोबारी, जानिए रोल मॉडल की कहानी

Badrinath Dham Yatra 2024: दिव्यांगों के लिए मिशाल साबित हुए सूरदास कृष्णपाल, भीख मंगवाने की बजाए बन गए कारोबारी, जानिए रोल मॉडल की कहानी
Last Updated: Sat, 22 Jun 2024

झारखंड दुमका के रहने वाले 34 वर्षीय कृष्णपाल बदरीनाथ धाम में सूरदास के नाम से प्रसिद्ध है। जन्म से अंधे कृष्णपाल को कुछ लोग मंदिर के बाहर भीख मंगवाने के लिए आए, लेकिन उसने ऐसा करके खुद का कारोबार किया और अपने परिवार का पालन-पोषण करता हैं।

चमोली: जन्म से अंधे कृष्णपाल दिव्यांगों के लिए रोल मोडल साबित हुए। उन्हें कुछ लोग भीख मंगवाने के लिए बदरीनाथ धाम लेकर आए थे, लेकिन स्वाभिमानी होने के कारण उन्होंने भीख मांगने से मना कर दिया। झारखंड दुमका के रहने वाले 34 वर्षीय कृष्णपाल बदरीनाथ धाम में भक्त सूरदास के नाम से प्रसिद्ध हैं और हर साल बदरीनाथ धाम आकर फेरी लगाते हुए बाबा का प्रसाद बेचता हैं। कृष्णपाल के पैतृक गांव दुमका में उसके बुजुर्ग माता पिता रहते हैं। वह प्रसाद की कमाई से अपने परिवार का लालन-पालन करता हैं।

कृष्णपाल जन्म से था अंधा

जानकारी के मुताबिक सूरदास कृष्णपाल को जन्म से ही दोनों आंखों से दिखाई नहीं देता है। गरीब परिवार में जन्मे लेने के कारण कृष्णपाल की आंखों में रोशनी लेन का कभी प्रयास ही नहीं किया गया और वह पढाई-लिखाई भी नहीं कर सका। कृष्णपाल बदरीनाथ धाम की यात्रा के लिए आया था। इस दौरान हरिद्धार में कुछ लोगों के साथ संपर्क हुआ और उन्होंने कृष्णपाल को बदरीनाथ आस्था पथ पर भीख मांगने के लिए बैठा दिया। लेकिन जब उसे इस बात का अहसास हुआ तो उसने भीख मांगने से साफ इनकार कर दिया।

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बताया कि भीख मांगने से मना करने पर साथियों ने भोजन आजीविका का वास्ता दिया। उन्होंने इस बात पर कहां कि सब कुछ नारायण के हाथ में हैं। यह कहते हुए उसने स्थानीय प्रसाद की दुकानों से प्रसाद खरीदकर उसे लाइन में लगे यात्रियों को बेचना शुरु किया। यात्रियों ने भी दिव्यांग के स्वरोजगार के प्रयासों से खुश होकर सारा प्रसाद हाथों हाथ खरीद लिया। यहीं से शुरु हुआ कृष्णपाल का स्वराेजगार का सफर।

टोकरी टांगकर प्रसाद बेचता है सूरदास

कृष्णपाल अपने गले में प्रसाद की टोकरी टांगकर लकड़ी के सहारे बदरीशपुरी में चक्कर लगते हुए प्रसाद बेचता है। उसको कई सालों में बदरीनाथ के पग पग का ज्ञान हो गया है। यात्री प्रसाद खरीदकर राशि उसकी टोकरी में रख देते हैं। प्रसाद के तय मूल्य से अधिक राशि देने पर कृष्णपाल उसे लेने से इनकार कर देता है। या फिर उस राशि के बदले अतिरिक्त प्रसाद दे देता है। बताया कि कृष्णपाल जिस व्यक्ति की आवाज और नाम एक बार सुन लेगा उसे दोबारा आवाज से ही उसे पहचान जाता हैं।

जानकारी के मुताबिक बदरीशपुरी में कृष्णपाल सबका चहेता बन गया है। वह सिक्कों और नोटों को हाथ लगाकर ही पहचान लेता है और मोबाइल फोन को भी बखूबी संचालित करता है। शीतकाल में बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद कृष्णपाल अपने गांव माता पिता के पास लौट जाता है। बताया कि उसको प्रसाद बेचने से इतनी आमदनी हो जाती कि वह अपने बुजुर्ग माता-पिता और स्वजनों की बेहतर ढंग से देखभाल कर लेता हैं।

कृष्णपाल ने दिव्यांगों से किया अनुरोध

कृष्णपाल ने कहां कि वह प्रसाद, सिंदूर, पूजा सामग्री बेचने पर उनका भुगतान क्यूआर कोड से डिजिटल पैमेंट भी स्वीकर करता है। कहां कि बाबा के दरबार में अभी तक किसी भी यात्री ने उन्हें अंधा होने के बाद भी ठगा नहीं। कृष्णपाल ने सभी दिव्यांगों से अनुरोध किया कि भीख मांगने की बजाय सभी स्वरोजगार की दिशा में कार्य करें। देश की जनता उनके दुख दर्दों को समझते हुए उनके स्वरोजगार को आगे बढ़ाने के लिए कुछ मदद भी करती है। मीडिया प्रभारी ने बताया कि बदरीनाथ धाम में कृष्णपाल खुद अपने हाथों से भोजन पकता है तथा कपड़े भी धोता है। वह प्रतिदिन नारायण के दर्शन करके स्वरोजगार की शुरुआत करता हैं।

 

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