NEET 2024 पेपर लीक मामले में गिरफ्तार अधिकांश आरोपी जमानत पर बाहर हैं। जांच रिकॉर्ड और कोर्ट दस्तावेज बताते हैं कि नेटवर्क की गतिविधियां जारी रहीं, जिससे 2026 में फिर पेपर लीक होने की आशंका सच साबित होती नजर आई।
नई दिल्ली: भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG एक बार फिर विवादों में है। 2026 में पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी, जिससे लाखों छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई। हालांकि यह संकट अचानक नहीं आया। 2024 के NEET पेपर लीक मामले की जांच, अदालतों में हुई सुनवाई और आरोपियों को मिली जमानतों का रिकॉर्ड पहले ही संकेत दे रहा था कि परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां बनी हुई हैं।
2024 के मामले में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, जांच एजेंसियों ने संगठित नेटवर्क का खुलासा किया और सरकार ने परीक्षा प्रणाली को “फुल-प्रूफ” बनाने का दावा भी किया। इसके बावजूद दो साल बाद फिर वही स्थिति सामने आ गई। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या 2024 के बाद वास्तव में कोई प्रभावी सुधार लागू हुआ था।
46 गिरफ्तारियां, लेकिन लगभग सभी आरोपी जमानत पर बाहर
2024 NEET पेपर लीक मामले की शुरुआत बिहार पुलिस की जांच से हुई थी, जिसे बाद में आर्थिक अपराध इकाई (EOW) और फिर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया।
जांच के दौरान कुल 46 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से 45 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन 44 आरोपी जमानत हासिल करने में सफल रहे। सिर्फ अमित प्रसाद महाराणा को अब तक राहत नहीं मिली है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतने बड़े मामले में अब तक ट्रायल शुरू नहीं हो पाया है।
मामले के कथित मास्टरमाइंड बताए गए संजीव मुखिया के खिलाफ भी CBI निर्धारित समय सीमा के भीतर पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी। परिणामस्वरूप उन्हें डिफॉल्ट बेल मिल गई। हालांकि अन्य मामलों के कारण वह अभी भी जेल में हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जब जांच पूरी हो जाती है और चार्जशीट दाखिल कर दी जाती है, तब अदालतें आरोपी के भागने, सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना और जांच की स्थिति को देखते हुए जमानत पर फैसला करती हैं।
नाम बदले, लेकिन ऑपरेशन का तरीका वही रहा
2024 और 2026 के मामलों में शामिल लोगों के नाम अलग हैं, लेकिन जांच में सामने आया मॉडल लगभग एक जैसा दिखाई देता है।
दोनों मामलों में कोचिंग संस्थानों, एडमिशन कंसल्टेंसी नेटवर्क और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े मध्यस्थों की भूमिका की चर्चा हुई। जांच एजेंसियों के अनुसार, 2024 में कई ऐसे लोग पकड़े गए थे जिनका संबंध पहले भी सॉल्वर गैंग, डमी कैंडिडेट और प्रवेश परीक्षा में धांधली से जुड़ी गतिविधियों से रहा था।
सबसे बड़ी चिंता यह रही कि कई आरोपी जमानत पर बाहर आने के बाद दोबारा शिक्षा और करियर काउंसलिंग से जुड़े कारोबार में सक्रिय पाए गए। इससे निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए।
परीक्षा से महीनों पहले शुरू हो गई थी तैयारी
CBI की जांच के अनुसार, 2024 के कथित पेपर लीक नेटवर्क ने परीक्षा से लगभग पांच महीने पहले तैयारी शुरू कर दी थी।
जांच में दावा किया गया कि नेटवर्क को भरोसा था कि वह झारखंड के एक परीक्षा केंद्र से प्रश्नपत्र तक पहुंच हासिल कर लेगा। इसी विश्वास के आधार पर सॉल्वर तैयार किए गए, उम्मीदवारों की पहचान की गई और यात्रा से लेकर ठहरने तक की व्यवस्थाएं पहले से की गईं।
आरोप है कि उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले प्रश्न और उत्तर रटवाने की व्यवस्था की गई थी। जांच एजेंसियों का कहना है कि यह कोई अचानक हुई साजिश नहीं थी, बल्कि लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से संचालित नेटवर्क का हिस्सा थी।
2024 मामले के पांच प्रमुख चेहरे
1. संजीव मुखिया: कथित मास्टरमाइंड, लेकिन पर्याप्त सबूत नहीं
संजीव मुखिया का नाम शुरुआती जांच में प्रमुख रूप से सामने आया था। उन्हें अप्रैल 2025 में गिरफ्तार किया गया, लेकिन CBI तय समय में उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी। इसी कारण उन्हें डिफॉल्ट बेल मिल गई।
2. अमित कुमार सिंह: सॉल्वर नेटवर्क का समन्वयक
जांच एजेंसियों के अनुसार, अमित कुमार सिंह ने बिहार, झारखंड, राजस्थान और ओडिशा सहित कई राज्यों से उम्मीदवारों और सॉल्वरों को जोड़ने का काम किया। उन पर पूरे नेटवर्क के संचालन और लॉजिस्टिक व्यवस्था संभालने का आरोप लगाया गया।
3. पंकज कुमार उर्फ आदित्य: पेपर पहुंचाने और सबूत मिटाने का आरोप
CBI का दावा है कि पंकज कुमार ने प्रश्नपत्र हासिल करने, उसे सॉल्वरों तक पहुंचाने और बाद में सबूत नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जांच में यह भी आरोप लगाया गया कि पेपर लीक से जुड़े कई मोबाइल फोन नष्ट कराए गए ताकि डिजिटल सबूत खत्म किए जा सकें।
4. राकेश रंजन उर्फ रॉकी: नेटवर्क मॉनिटरिंग का जिम्मा
राकेश रंजन पर आरोप था कि वह पूरे ऑपरेशन की निगरानी कर रहा था और विभिन्न स्थानों पर मौजूद लोगों के बीच समन्वय बनाए हुए था। जांच एजेंसियों के मुताबिक उसने संवेदनशील दस्तावेज सीधे अपने पास रखने से भी परहेज किया।
5. रंजीत कुमार बेउरा: काउंसलिंग नेटवर्क के जरिए उम्मीदवारों तक पहुंच
जांच में रंजीत कुमार बेउरा और उनके शिक्षा-काउंसलिंग नेटवर्क का नाम भी सामने आया। आरोप था कि मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों से संपर्क कर ऐसे परिवारों की पहचान की जाती थी जो भारी रकम खर्च करने में सक्षम हों। बाद में कथित तौर पर उन्हें बेहतर रैंक और सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाने के नाम पर प्रस्ताव दिए जाते थे।
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2026 मामले में भी जांच एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
2026 NEET पेपर लीक मामले में अब तक कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और जांच CBI के पास है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में भी अभियोजन पक्ष को वही चुनौतियां झेलनी पड़ सकती हैं जो 2024 में सामने आई थीं।
यदि प्रश्नपत्र की भौतिक कॉपी बरामद नहीं होती या जानकारी मौखिक रूप से साझा की गई हो, तो अदालत में प्रत्यक्ष सबूत पेश करना कठिन हो जाता है।
2026 मामले में आरोप है कि एक केमिस्ट्री लेक्चरर ने प्रश्नपत्र तक पहुंच का इस्तेमाल करते हुए जानकारी याद कर उसे आगे साझा किया। यदि जांच में यही मॉडल साबित होता है, तो लीक हुए पेपर की रिकवरी लगभग असंभव हो सकती है।
भारत की परीक्षा प्रणाली के लिए बड़ा सबक
NEET जैसी परीक्षाएं हर साल लाखों छात्रों के भविष्य का फैसला करती हैं। ऐसे में बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक मामले सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ तकनीकी सुरक्षा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। परीक्षा केंद्रों की निगरानी, कोचिंग और काउंसलिंग नेटवर्क की जांच, मामलों का त्वरित ट्रायल और दोषियों को समयबद्ध सजा जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं।
2024 के मामले में हुई गिरफ्तारियां, बाद में मिली जमानतें और लंबित ट्रायल यह संकेत देते हैं कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार ने भी सिस्टम की कमजोरियों को उजागर किया। 2026 का विवाद इसी बात की याद दिलाता है कि परीक्षा सुरक्षा केवल पेपर लीक रोकने का मामला नहीं है, बल्कि लीक होने के बाद जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी प्रश्न है।








