दिसंबर 2025 में महंगाई दर 1.3% तक पहुंची। कोर महंगाई और उपभोक्ता मांग कमजोर रही। विशेषज्ञों के अनुसार, RBI 2026 में ब्याज दरों में 0.25-0.50% कटौती कर सकता है, जिससे निवेश और खर्च बढ़ेगा।
RBI Update: दिसंबर 2025 में देश की महंगाई दर यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में हल्की बढ़ोतरी हुई और यह 1.3 फीसदी पर पहुंच गई। नवंबर में यह 0.7 फीसदी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ोतरी अनुमान के अनुसार हुई है और इसका मुख्य कारण खाने-पीने की चीजों के दामों का धीरे-धीरे सामान्य होना है। खासकर सब्जियों के दाम अब पहले जितने ज्यादा नहीं गिर रहे, जिससे कुल महंगाई में थोड़ी तेजी आई है।
नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर में खाद्य महंगाई -1.8 फीसदी रही जबकि नवंबर में यह -2.8 फीसदी थी। इसका मुख्य कारण यह है कि सब्जियों के दाम नवंबर की तुलना में अब कम गिर रहे हैं। उदाहरण के लिए, नवंबर में सब्जियों के दाम साल भर पहले के मुकाबले 22 फीसदी कम हुए थे, जबकि दिसंबर में यह गिरावट घटकर 18 फीसदी रह गई। इसके अलावा सब्जियों को छोड़कर बाकी खाने-पीने की चीजों के दाम लगभग स्थिर रहे, जिससे पता चलता है कि कुल खाद्य महंगाई अभी ज्यादा बढ़ी नहीं है।
कोर महंगाई में नरमी, मांग में कमजोरी
कोर महंगाई यानी उस महंगाई को कहते हैं जिसमें खाना और ईंधन शामिल नहीं होते, दिसंबर में भी कम बनी रही। सोना और चांदी के दाम ज्यादा होने की वजह से कुल कोर महंगाई 4.6 फीसदी रही। लेकिन जब सोना-चांदी, पेट्रोल और डीजल को हटाया गया, तो कोर महंगाई घटकर 2.4 फीसदी रह गई, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है।
कपड़े, मकान, स्वास्थ्य सेवाएं, मनोरंजन और परिवहन जैसी जरूरी चीजों के दाम भी धीरे-धीरे बढ़े हैं। यह संकेत देता है कि बाजार में लोगों की खरीदारी अभी कमजोर है और कुल मांग में तेजी नहीं है।
महंगाई पर आने वाले महीनों का अनुमान
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में सब्जियों के दाम धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर आ जाएंगे, जिससे महंगाई में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। पुराने आंकड़ों का असर भी खत्म होगा, इसलिए महंगाई में हल्का उछाल दिख सकता है। इसके बावजूद, कुल महंगाई दर RBI की तय सीमा के भीतर रहने की उम्मीद है। वहीं, जीएसटी में संभावित कटौती और कमजोर उपभोक्ता मांग की वजह से कोर महंगाई पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ने की संभावना है।
आर्थिक स्थिति और मांग कमजोर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश में लोगों की आमदनी और कंपनियों का मुनाफा अभी कमजोर है। वैश्विक अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति भी भारतीय निर्यात पर असर डाल सकती है। ऐसे समय में, जब महंगाई नियंत्रण में है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी है, RBI के पास ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश खुलती है।
RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती का विकल्प
विशेषज्ञों के अनुसार, RBI 2026 में ब्याज दरों में 0.25 से 0.50 फीसदी तक की कटौती कर सकता है। यह कदम अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ाने और निवेश तथा खर्च को प्रोत्साहित करने के लिए उठाया जा सकता है। कम ब्याज दर से कर्ज लेना सस्ता होगा, जिससे आम आदमी और व्यवसायों दोनों को फायदा मिलेगा।











