उत्तर प्रदेश के आगरा में करीब 5 करोड़ रुपये की दवाओं से जुड़े मामले की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। दवाओं के नाले और झाड़ियों में मिलने के बाद मामला सामने आया था, जिसके बाद संबंधित दवाओं और उनके स्रोत को लेकर जांच शुरू की गई। हालांकि, नोटिस जारी किए जाने के बावजूद संबंधित कंपनियों की ओर से जवाब नहीं मिलने के कारण जांच की प्रक्रिया अटकी हुई है। इतनी बड़ी कीमत की दवाओं का खुले स्थानों पर मिलना दवाओं के रखरखाव, आपूर्ति और निस्तारण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं नाले और झाड़ियों तक कैसे पहुंचीं। सामान्य तौर पर दवाओं की आपूर्ति और वितरण के दौरान उनके स्रोत, बैच नंबर, निर्माण की तारीख, एक्सपायरी डेट और संबंधित रिकॉर्ड का पता लगाया जा सकता है। ऐसे में जांच के लिए यह जानकारी जुटाना जरूरी है कि बरामद दवाएं किन कंपनियों की थीं, उनकी आपूर्ति कहां की गई थी और उन्हें खुले स्थानों पर किस परिस्थिति में फेंका गया। इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ा जा सकता है।
दवाओं से जुड़े इस मामले में कंपनियों को नोटिस जारी किए जाने के बावजूद जवाब नहीं मिलना जांच की गति को प्रभावित कर रहा है। संबंधित कंपनियों की ओर से जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण दवाओं के स्रोत और उनके नाले या झाड़ियों तक पहुंचने की परिस्थितियों का स्पष्ट पता लगाने में कठिनाई हो रही है। जांच में कंपनियों का जवाब महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि उनके रिकॉर्ड से दवाओं के निर्माण, सप्लाई और वितरण से संबंधित जानकारी का मिलान किया जा सकता है। हालांकि, कंपनियों की ओर से जवाब नहीं देने के पीछे क्या कारण है, इस बारे में फिलहाल स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
करीब 5 करोड़ रुपये की दवाओं का मामला होने के कारण यह भी जांच का महत्वपूर्ण पहलू है कि बताई गई कीमत किन आधारों पर निर्धारित की गई है। दवाओं की वास्तविक मात्रा, उनकी श्रेणी, पैकिंग और बाजार मूल्य की पुष्टि के बाद ही मामले की आर्थिक गंभीरता का सटीक आकलन किया जा सकता है। इसके साथ ही यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि बरामद दवाएं इस्तेमाल के योग्य थीं या नहीं और क्या उन्हें किसी सरकारी अथवा निजी स्वास्थ्य संस्थान, वितरक या अन्य माध्यम से भेजा गया था। इन पहलुओं की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही हो सकेगी।
नाले और झाड़ियों में दवाएं मिलने से उनके सुरक्षित निस्तारण को लेकर भी सवाल उठते हैं। यदि दवाएं एक्सपायर हो चुकी थीं या किसी वजह से इस्तेमाल के योग्य नहीं थीं, तो उनका निस्तारण निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाना जरूरी है। वहीं, यदि दवाएं इस्तेमाल के योग्य थीं, तो उनके खुले स्थानों पर मिलने की परिस्थितियों की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दवाओं को इस तरह फेंके जाने से पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों और लोगों की पहुंच में आने के जोखिम का भी आकलन किया जाना चाहिए।
जांच को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित कंपनियों से जवाब प्राप्त करना, दवाओं की पहचान और दस्तावेजों का मिलान करना तथा उनके वितरण से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल करना महत्वपूर्ण होगा। जरूरत पड़ने पर संबंधित विभागों को यह भी पता लगाना होगा कि दवाओं की सप्लाई के दौरान कहीं रिकॉर्ड में गड़बड़ी तो नहीं हुई और उन्हें नष्ट करने या वापस भेजने से जुड़ी प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं। हालांकि, अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी कंपनी या व्यक्ति की जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता।
फिलहाल, नोटिस के बाद भी कंपनियों की ओर से जवाब नहीं मिलने के कारण करीब 5 करोड़ रुपये की दवाओं का मामला जांच में अटका हुआ है। अब आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित कंपनियां कब तक अपना पक्ष और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराती हैं तथा जांच एजेंसियां दवाओं के स्रोत और उनके नाले व झाड़ियों में मिलने की परिस्थितियों की पुष्टि कैसे करती हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और संबंधित तथ्यों की पुष्टि के बाद ही सामने आ सकेगा।









