कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों पर सरकार के रुख को असंवेदनशील बताया। उन्होंने संसद में दिए गए जवाब पर सवाल उठाते हुए Lancet और NFHS अध्ययनों का हवाला दिया।
New Delhi: देश में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर चुनौती बना हुआ है। राजधानी दिल्ली से लेकर बड़े महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक खराब हवा लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रही है। इसी मुद्दे पर अब राजनीतिक टकराव भी तेज हो गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों और बीमारियों को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर कड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने इसे न सिर्फ चिंताजनक बताया बल्कि सरकार की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े किए हैं।
राज्यसभा में सरकार के जवाब पर आपत्ति
जयराम रमेश ने कहा कि 9 दिसंबर को राज्यसभा में सरकार ने दावा किया कि देश में ऐसा कोई निर्णायक data उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मृत्यु या बीमारी का सीधा संबंध वायु प्रदूषण से है। उन्होंने बताया कि इससे पहले 29 जुलाई 2024 को भी सरकार ने संसद में इसी तरह का बयान दिया था। रमेश के मुताबिक यह बयान न सिर्फ हैरान करने वाला है बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों की अनदेखी भी करता है।
सरकार का रुख बताया असंवेदनशील
कांग्रेस नेता ने वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों के मामले में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के रवैये को “चौंकाने वाली असंवेदनशीलता” करार दिया। उन्होंने कहा कि जब देश में लाखों लोग प्रदूषित हवा के कारण बीमार पड़ रहे हैं और जान गंवा रहे हैं, तब सरकार का यह कहना कि निर्णायक डेटा नहीं है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। रमेश ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन में तत्काल और ठोस सुधार की मांग की।
लैंसेट स्टडी का हवाला
जयराम रमेश ने अपने बयान में latest scientific evidence का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जुलाई 2024 की शुरुआत में प्रतिष्ठित medical journal The Lancet में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया कि भारत में होने वाली कुल मौतों में से 7.2 प्रतिशत मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ 10 बड़े शहरों में हर साल लगभग 34 हजार लोगों की जान प्रदूषित हवा के कारण जा रही है।
NFHS डेटा से गंभीर संकेत

उन्होंने अगस्त 2024 में मुंबई स्थित International Institute of Population Sciences की एक स्टडी का भी हवाला दिया। इस अध्ययन में National Family Health Survey यानी NFHS-5 के सरकारी आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक जिन जिलों में वायु प्रदूषण National Ambient Air Quality Standards यानी NAAQS से अधिक है, वहां वयस्कों में समय से पहले मृत्यु दर 13 प्रतिशत तक बढ़ गई है। बच्चों के मामले में यह आंकड़ा और भी डराने वाला है, जहां मृत्यु दर में लगभग 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दीर्घकालिक प्रभाव और लाखों अतिरिक्त मौतें
जयराम रमेश ने कहा कि प्रदूषित हवा का असर सिर्फ तात्कालिक नहीं बल्कि long-term होता है। दिसंबर 2024 में The Lancet Planetary Health में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अगर भारत WHO यानी World Health Organization द्वारा सुझाई गई सुरक्षित सीमा का पालन नहीं करता, तो प्रदूषित हवा के लंबे संपर्क के कारण हर साल लगभग 15 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह आंकड़ा अपने आप में स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
उन्होंने नवंबर 2025 में अमेरिका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय के Institute of Health Metrics and Evaluation की रिपोर्ट का भी जिक्र किया। इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लगभग 20 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हुई हैं। साल 2000 की तुलना में यह आंकड़ा 43 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार Chronic Obstructive Pulmonary Disease यानी COPD से होने वाली लगभग 70 प्रतिशत मौतों के पीछे भी वायु प्रदूषण एक बड़ी वजह है।
एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड पर सवाल
जयराम रमेश ने कहा कि National Ambient Air Quality Standards को तत्काल अपडेट करने की जरूरत है। उन्होंने याद दिलाया कि इन मानकों को आखिरी बार नवंबर 2009 में संशोधित किया गया था। रमेश के अनुसार मौजूदा PM2.5 standards, WHO के annual exposure guidelines से 8 गुना और 24-hour exposure guidelines से 4 गुना अधिक हैं। इसका मतलब है कि भारत में तय मानक खुद ही लोगों की सेहत के लिए खतरा बने हुए हैं।
NCAP और GRAP की आलोचना
कांग्रेस नेता ने National Clean Air Programme यानी NCAP और Graded Response Action Plans यानी GRAPs की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये योजनाएं reactive approach पर आधारित हैं। जरूरत इस बात की है कि पूरे साल proactive measures लागू किए जाएं। रमेश के मुताबिक 2017 में NCAP की शुरुआत के बावजूद PM2.5 का स्तर लगातार बढ़ रहा है। आज देश का हर नागरिक ऐसे इलाकों में रह रहा है, जहां प्रदूषण का स्तर WHO guidelines से कहीं ज्यादा है।











