प्रयागराज, 26 दिसंबर 2025: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक छेड़छाड़ मामले में अहम आदेश दिया है कि मजिस्ट्रेट संज्ञान लेते समय आईपीसी की धाराओं को नहीं जोड़ या घटा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धाराओं में बदलाव केवल आरोप तय (charge framing) के चरण में ही संभव है, न कि संज्ञान लेते समय।
मिर्जापुर के एक छेड़छाड़ प्रकरण में पुलिस ने जांच के बाद याचियों के खिलाफ आईपीसी की धाराएँ 354 ए (यौन उत्पीड़न), 504 (शांति भंग), 506 (आपराधिक धमकी) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
आरोपी पक्ष ने समन जारी करने के आदेश को रद्द करने की मांग अदालत में की और दलील दी कि मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेते समय धाराओं को हटाने या बदलने का अधिकार होना चाहिए।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने की प्रक्रिया के दौरान धाराओं में बदलाव नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि धाराओं को हटाना या जोड़ना आरोप तय करने के चरण के समान है, जो आगे की मुकदमेबाज़ी के लिए निर्धारित समय पर ही किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेने का मतलब मामला आगे बढ़ाना है, जबकि धाराओं में संशोधन की अनुमति केवल चार्ज फ्रेमिंग (आरोप तय करने) के समय ही दी जानी चाहिए ताकि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के नियमों का सख़्ती से पालन हो सके।
मजिस्ट्रेट आईपीसी की धाराओं को जोड़/घटा नहीं सकता जब वह संज्ञान ले रहा हो। धाराओं में बदलाव आरोप तय (charge framing) के चरण पर ही संभव है।










