बांग्लादेश चुनाव 2026 से पहले BNP की मजबूती, विपक्षी दलों में बानी नई साठगांठ

बांग्लादेश चुनाव 2026 से पहले राजनीति गरमा गई है। BNP नेता तारिक रहमान की वापसी और भारत विरोधी दलों के संभावित गठबंधन से नए सियासी समीकरण बनते दिख रहे हैं।

बांग्लादेश में 2026 के चुनाव से पहले राजनीति में हलचल तेज हो गई है। BNP नेता तारिक रहमान की वापसी और जमात-ए-इस्लामी व NCP जैसे भारत विरोधी दलों के संभावित गठबंधन से सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।

Dhaka: बांग्लादेश में फरवरी महीने में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले देश की राजनीति तेजी से करवट ले रही है। चुनाव की तारीख नजदीक आते ही राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और सियासी साठगांठ का दौर शुरू हो गया है। खास बात यह है कि इस बार भारत विरोधी मानी जाने वाली पार्टियां एक मंच पर आती नजर आ रही हैं। इन बदलते समीकरणों के केंद्र में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान की देश वापसी को बेहद अहम माना जा रहा है।

तारिक रहमान की वापसी से बदला राजनीतिक माहौल

पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और BNP के शीर्ष नेता तारिक रहमान की बांग्लादेश वापसी को सियासी दृष्टि से बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। BNP बांग्लादेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक है और तारिक रहमान की सक्रिय भूमिका से पार्टी के फिर से मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तारिक रहमान की वापसी ने बाकी दलों को भी अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। यही वजह है कि कई छोटे और मध्यम दल अब बड़े गठबंधन का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत की जा सके।

भारत विरोधी दलों में बढ़ती नजदीकियां

इन सियासी गतिविधियों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी यानी NCP के संभावित गठबंधन को लेकर हो रही है। दोनों ही पार्टियां अपने भारत विरोधी रुख के लिए जानी जाती हैं। माना जा रहा है कि दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर लगभग सहमति बन चुकी है और अब सिर्फ सीट शेयरिंग पर अंतिम बातचीत बाकी है।

यह गठबंधन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह बांग्लादेश की राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण की ओर इशारा करता है, जहां भारत को लेकर सख्त रुख रखने वाली ताकतें एकजुट होती दिख रही हैं।

जमात-ए-इस्लामी का पुराना रुख

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रही है और उस पर पाकिस्तान समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात की भूमिका को लेकर भी विवाद रहा है। पार्टी पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि वह भारत विरोधी एजेंडे को लगातार आगे बढ़ाती रही है।

जमात का राजनीतिक आधार भले ही सीमित हो, लेकिन गठबंधन की राजनीति में उसकी भूमिका हमेशा अहम रही है। यही वजह है कि चुनाव से पहले कई दल जमात के साथ समझौते की संभावना तलाशते नजर आ रहे हैं।

एनसीपी का उभार और उसकी राजनीति

नेशनल सिटिजन पार्टी यानी NCP अपेक्षाकृत नई पार्टी है। इसका गठन पिछले साल उस समय हुआ था, जब देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ बड़े पैमाने पर छात्र आंदोलन हुए थे। इस पार्टी की अगुवाई उन्हीं छात्र नेताओं ने की, जिन्होंने आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

NCP के नेता भी शुरुआत से ही भारत के खिलाफ तीखे बयान देते रहे हैं। पार्टी खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग और एक वैकल्पिक शक्ति के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है। चुनाव से पहले किसी बड़े दल के साथ गठबंधन करना NCP की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

BNP के साथ गठबंधन की कोशिश नाकाम

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक NCP पहले BNP के साथ गठबंधन करना चाहती थी। इसके लिए दोनों दलों के बीच शुरुआती बातचीत भी हुई, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन सकी। BNP के मजबूत संगठन और बड़े राजनीतिक आधार के कारण वह ज्यादा सीटें छोड़ने को तैयार नहीं थी।

BNP से बात अटकने के बाद NCP ने जमात-ए-इस्लामी से संपर्क किया। इस बार बातचीत अपेक्षाकृत आगे बढ़ती नजर आ रही है और दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

पार्टी के अंदर मतभेद भी सामने

हालांकि NCP के भीतर इस संभावित गठबंधन को लेकर एक राय नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार पार्टी का एक धड़ा जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन के खिलाफ है। इस गुट का मानना है कि जमात के साथ जाने से पार्टी की छवि प्रभावित हो सकती है।

इस धड़े का कहना है कि तारिक रहमान की बांग्लादेश वापसी के बाद एक बार फिर BNP के साथ बातचीत की जानी चाहिए। उनका मानना है कि BNP के साथ गठबंधन चुनावी तौर पर ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।

सीट शेयरिंग पर लगभग सहमति

NCP नेताओं के मुताबिक पार्टी की शीर्ष नेतृत्व ने जमात-ए-इस्लामी के वरिष्ठ नेताओं के साथ सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत की है। शुरुआत में NCP ने 50 सीटों की मांग रखी थी, लेकिन लंबी चर्चा के बाद पार्टी 30 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हो गई है।

समझौते के तहत बाकी सीटों पर NCP अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी और जमात के प्रत्याशियों का समर्थन करेगी। इस तरह दोनों दल एक-दूसरे की ताकत को जोड़कर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

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