अमेरिकी डिप्लोमैट Nicholas Burns ने कहा है कि भारत अगले 40 सालों में दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है। उन्होंने भारत की वैज्ञानिक क्षमता, युवा आबादी और रणनीतिक स्थिति को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया।
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिक और भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील के प्रमुख वार्ताकार रहे निकोलस बर्न्स ने भारत के भविष्य को लेकर एक अहम और दूरगामी भविष्यवाणी की है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के न्यू डिप्लोमेसी प्रोग्राम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत अगले 40 वर्षों में दुनिया की सबसे प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।
बर्न्स के अनुसार भारत का तेज आर्थिक विकास, विशाल युवा आबादी, वैज्ञानिक क्षमता और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति इसे एक संभावित महाशक्ति बनाती है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं।
भारत की ताकत: विज्ञान, युवा आबादी और रणनीतिक लोकेशन
निकोलस बर्न्स ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के पास वे सभी तत्व मौजूद हैं जो किसी भी देश को महाशक्ति बनने के लिए आवश्यक होते हैं। उन्होंने विशेष रूप से भारत की युवा आबादी को उसकी सबसे बड़ी ताकत बताया, जो टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में तेजी से आगे बढ़ रही है।
बर्न्स ने कहा कि आज की वैश्विक व्यवस्था में “मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता” किसी भी देश की असली शक्ति होती है, और भारत इस क्षेत्र में तेजी से मजबूत स्थिति बना रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक केंद्रीय भूमिका देती है। समुद्री व्यापार मार्गों के बीच स्थित भारत न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण देश बन चुका है।
भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील: रिश्तों का टर्निंग पॉइंट
निकोलस बर्न्स केवल एक डिप्लोमैट नहीं, बल्कि 2005-2008 के बीच हुई भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील के प्रमुख वार्ताकार भी रहे हैं। उन्होंने इस समझौते को दोनों देशों के संबंधों में “ऐतिहासिक मोड़” बताया।
उनके अनुसार इस डील ने भारत को वैश्विक परमाणु अलगाव से बाहर निकाला और अमेरिका-भारत संबंधों को एक रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया। यह समझौता दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग का आधार बना।
बर्न्स लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि भारत का उदय अमेरिका के लिए भी रणनीतिक रूप से लाभकारी है और यह साझेदारी भविष्य में वैश्विक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

चीन के खिलाफ रणनीतिक संतुलन में भारत की भूमिका
बर्न्स ने अपने बयान में यह भी कहा कि आने वाले दशकों में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिस्पर्धी रहेगा। ऐसे में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने कहा कि भारत, अमेरिका, जापान और अन्य सहयोगी देशों के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
बर्न्स के अनुसार भारत एक “नेचुरल पार्टनर” है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक हितों के आधार पर वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता ला सकता है।
वैश्विक राजनीति में भारत का बढ़ता प्रभाव
निकोलस बर्न्स ने यह भी कहा कि भारत का उदय केवल एक संभावना नहीं, बल्कि एक “वास्तविकता” है, जो पहले से ही दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस तरह से अपनी आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक स्थिति मजबूत की है, वह आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है।
उन्होंने अमेरिका की कुछ नीतियों पर अप्रत्यक्ष रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत जैसे उभरते साझेदार से दूरी बनाना रणनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।
भविष्य की दिशा: भारत एक वैश्विक शक्ति केंद्र की ओर
बर्न्स की यह भविष्यवाणी भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव की ओर संकेत करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपनी वर्तमान विकास गति को बनाए रखता है, तो वह 21वीं सदी के मध्य तक दुनिया की शीर्ष आर्थिक और रणनीतिक शक्तियों में शामिल हो सकता है।
भारत की भूमिका अब केवल एक क्षेत्री









