AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिजाब से जुड़े फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान ओवैसी ने कोर्ट के फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि धार्मिक मामलों में अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए।
लखनऊ: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व और राजनीतिक नेतृत्व को लेकर बड़ा बयान दिया है। हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान ओवैसी ने मुस्लिम समुदाय से एकजुट होने और अपनी राजनीतिक आवाज को मजबूत करने की अपील की। उन्होंने बिहार में दिखी राजनीतिक सक्रियता का उदाहरण देते हुए उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह की ताकत दिखाने की बात कही।
ओवैसी का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक समीकरणों और विभिन्न दलों की सामाजिक रणनीतियों को लेकर चर्चा तेज है। राज्य की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है और अलग-अलग दल इस वर्ग के समर्थन को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते रहे हैं।
हिजाब मामले पर हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल
अपने संबोधन में ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की, जिसमें स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज किया गया था। उन्होंने इसे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक मामलों से जुड़ा विषय बताते हुए अदालत के फैसले पर आपत्ति जताई। ओवैसी का कहना था कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में मुस्लिम समुदाय की भावनाओं और अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनके बयान ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता, स्कूलों में ड्रेस कोड और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर राजनीतिक बहस को चर्चा में ला दिया है।
मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत करने की अपील
AIMIM प्रमुख ने अपने भाषण में मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने लोगों से राजनीतिक रूप से संगठित होने और अपनी कयादत मजबूत करने की अपील की। ओवैसी ने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मुस्लिम मतदाताओं ने जिस तरह अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया, वैसी ही एकजुटता उत्तर प्रदेश में भी दिखाई जानी चाहिए। उनके इस बयान को यूपी में AIMIM के राजनीतिक विस्तार की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहां विधानसभा की 403 सीटें हैं। राज्य में मुस्लिम मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। हालांकि, मुस्लिम वोट का राजनीतिक रुझान हमेशा एक जैसा नहीं रहा है और स्थानीय उम्मीदवार, गठबंधन तथा क्षेत्रीय मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
अखिलेश यादव के सामने अलग राजनीतिक चुनौती
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उत्तर प्रदेश में ओवैसी की राजनीति का सीधा असर समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव की रणनीति पर पड़ सकता है। समाजवादी पार्टी परंपरागत रूप से मुस्लिम और यादव मतदाताओं के समर्थन को अपने प्रमुख सामाजिक आधार के रूप में देखती रही है। हालांकि, मौजूदा दौर में अखिलेश यादव के सामने केवल मुस्लिम समर्थन बनाए रखने की चुनौती नहीं है। उन्हें व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करने के लिए अन्य वर्गों के मतदाताओं को भी साथ जोड़ना पड़ता है।
ऐसे में AIMIM अगर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाती है, तो विपक्षी दलों के बीच वोटों के बंटवारे की संभावना बढ़ सकती है। यही वजह है कि ओवैसी के बयानों को यूपी की व्यापक चुनावी रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
मनुस्मृति को लेकर भी सियासी बहस तेज
ओवैसी ने अपने संबोधन में मनुस्मृति को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर भी टिप्पणी की। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि संघ से जुड़े कुछ लोगों ने अतीत में मनुस्मृति को लेकर समर्थन की बात कही थी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मनुस्मृति को लेकर चर्चा हो रही है तो उसके विभिन्न प्रावधानों पर भी सार्वजनिक रूप से बहस होनी चाहिए। ओवैसी ने विशेष रूप से दलितों से जुड़े कथित प्रावधानों का उल्लेख करते हुए BJP और RSS से अपना पक्ष स्पष्ट करने की मांग की।
हालांकि, इन राजनीतिक दावों पर बीजेपी की ओर से अलग प्रतिक्रिया सामने आई है। बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने मनुस्मृति को लेकर कांग्रेस और विपक्षी नेताओं के बयानों पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष प्राचीन ग्रंथ की गलत व्याख्या करके राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहा है।
त्रिवेदी ने यह भी सवाल उठाया कि मनुस्मृति को लेकर चर्चा करने वाले नेता किस मूल पाठ या संस्करण के आधार पर अपने दावे कर रहे हैं। बीजेपी का तर्क है कि प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक राजनीतिक बहस में संदर्भ से अलग करके पेश नहीं किया जाना चाहिए।








