बांग्लादेश में 2025 के आम चुनाव से पहले राजनीतिक संकट गहरा गया है। जमात-ए-इस्लामी ने जनमत संग्रह की मांग उठाई है जबकि बीएनपी ने इसका विरोध किया है। इस विवाद से देश की चुनावी प्रक्रिया पर अनिश्चितता बढ़ गई है।
Bangladesh Election: बांग्लादेश में अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीति में उथल-पुथल मच गई है। देश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव को लेकर नया पेंच फंसा दिया है। पार्टी का कहना है कि जब तक राष्ट्रीय चार्टर पर जनमत संग्रह (Referendum) नहीं कराया जाता, तब तक चुनाव नहीं होना चाहिए। इस ऐलान से देश के राजनीतिक माहौल में तनाव बढ़ गया है और चुनाव पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
जनमत संग्रह की मांग पर विवाद शुरू
ढाका में मंगलवार को आयोजित रैली में जमात-ए-इस्लामी ने प्रस्तावित आम चुनाव का कड़ा विरोध जताया। पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान ने कहा कि सरकार को पहले राष्ट्रीय चार्टर को कानूनी दर्जा देने के लिए जनमत संग्रह कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि फरवरी में प्रस्तावित चुनाव तब तक नहीं हो सकते, जब तक जनता से इस चार्टर पर राय नहीं ली जाती।
रहमान ने कहा कि देश के स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों की एक ही मांग है – चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनमत संग्रह कराना चाहिए। उनका यह बयान आगामी चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजधानी ढाका में शक्ति प्रदर्शन
जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने राजधानी में आयोजित रैली में सात अन्य इस्लामवादी सहयोगी दलों के साथ मंच साझा किया। यह रैली जमात की राजनीतिक ताकत का स्पष्ट प्रदर्शन थी। उन्होंने कहा कि जब तक मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय आम सहमति आयोग (National Consensus Commission) द्वारा तैयार किए गए जुलाई चार्टर को कानूनी मान्यता नहीं मिलती, तब तक चुनाव नहीं हो सकते।
जमात और बीएनपी में बढ़ता टकराव
जमात-ए-इस्लामी का रुख अब पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) से टकरा गया है। बीएनपी स्पष्ट रूप से जनमत संग्रह कराने के खिलाफ है। पार्टी का कहना है कि संविधान में ऐसी कोई प्रक्रिया मौजूद नहीं है।
बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने ठाकुरगांव में आयोजित रैली में कहा, “जमात चुनाव से डर रही है क्योंकि उसे पता है कि अगर चुनाव हुए तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा।” इस बयान ने दोनों दलों के बीच दरार को और गहरा कर दिया है।

चार्टर पर सहमति लेकिन अमल पर विवाद
पिछले महीने बीएनपी और जमात ने एक उच्चस्तरीय बैठक में 84 प्रस्तावों वाले राष्ट्रीय चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। यह चार्टर देश के राजनीतिक सुधार और चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का दावा करता है। लेकिन अब इसके कार्यान्वयन को लेकर विवाद पैदा हो गया है।
जमात का कहना है कि अगर सभी दलों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं तो जनमत संग्रह कराना ही तार्किक कदम है। वहीं बीएनपी का मानना है कि संसद इस पर विचार करने का सही मंच है, क्योंकि संविधान में जनमत संग्रह का कोई उल्लेख नहीं है।
बीएनपी की शर्तें और रुख में बदलाव
शुरुआत में बीएनपी ने जनमत संग्रह के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया था। लेकिन बाद में पार्टी ने अनिच्छा से इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। बीएनपी ने यह शर्त रखी कि जनमत संग्रह अगर हो भी, तो उसे राष्ट्रीय चुनाव के दिन ही कराया जाए।
पार्टी का तर्क है कि इससे अतिरिक्त खर्च और प्रशासनिक बोझ नहीं बढ़ेगा। हालांकि जमात का कहना है कि जनमत संग्रह पहले होना चाहिए ताकि चार्टर को वैधता मिल सके और चुनाव उसी के आधार पर हो।
बीएनपी का आरोप – संविधान से हो रहा खिलवाड़
बीएनपी की नीति निर्धारण स्थायी समिति के सदस्य अमीर खासरू महमूद चौधरी ने पिछले सप्ताह कहा था कि अंतरिम सरकार ने संविधान की रक्षा की शपथ ली है। उनके अनुसार “इस संविधान में जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है।”
बीएनपी ने यह भी आरोप लगाया कि आम सहमति आयोग (Consensus Commission) के अंतिम मसौदे में पार्टी के कई असहमति नोट्स को हटा दिया गया है। पार्टी का दावा है कि इनमें से कुछ बिंदु बांग्लादेश के संविधान के खिलाफ हैं।
जनमत संग्रह की समयसीमा खत्म, बढ़ी अनिश्चितता
अंतरिम सरकार ने राजनीतिक दलों को जनमत संग्रह पर सहमति बनाने के लिए सात दिन का समय दिया था। यह समयसीमा अब समाप्त हो चुकी है, लेकिन कोई सर्वसम्मति नहीं बन सकी।
अधिकारियों का कहना है कि अब अंतरिम प्रशासन चार्टर के कार्यान्वयन और जनमत संग्रह के समय निर्धारण पर एकतरफा निर्णय लेने की तैयारी कर रहा है। यह स्थिति और गंभीर हो सकती है क्योंकि बीएनपी ने इस मुद्दे पर जमात के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत से इनकार कर दिया है।











