Bankers Books Evidence Act 2026: 1 अक्टूबर से डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड होंगे कोर्ट में मान्य

Bankers Books Evidence Act 2026 के तहत 1 अक्टूबर से डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड को कोर्ट में कानूनी सबूत के तौर पर मान्यता मिलेगी। जानें नए नियम से बैंकिंग और

बैंकिंग रिकॉर्ड को कानूनी सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने से जुड़े करीब 135 साल पुराने कानून में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट, 
2026 आगामी 1 अक्टूबर 2026 से लागू होगा।

बिजनेस न्यूज़: भारत के बैंकिंग और न्यायिक तंत्र में 1 अक्टूबर 2026 से बड़ा बदलाव होने जा रहा है। Bankers Books Evidence Act 2026 के लागू होने के साथ बैंकिंग रिकॉर्ड को कानूनी सबूत के तौर पर स्वीकार करने से जुड़े करीब 135 साल पुराने कानून की जगह नया और आधुनिक कानूनी ढांचा लेगा। नए कानून में कागजी दस्तावेजों के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, वर्चुअल और क्लाउड पर सुरक्षित बैंकिंग रिकॉर्ड को भी कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता दी जाएगी।

वित्त मंत्रालय के अनुसार, नए कानून का उद्देश्य बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों के अनुरूप कानूनी व्यवस्था को आधुनिक बनाना है। Bankers Books Evidence Act, 2026 को 13 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी। इसके बाद 10 सितंबर को जारी अधिसूचना के जरिए इसके लागू होने की तारीख 1 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई।

डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड को मिलेगा कानूनी आधार

नए कानून की सबसे अहम विशेषता बैंकिंग रिकॉर्ड की विस्तृत और आधुनिक परिभाषा है। अब बैंक की किताबों या रिकॉर्ड का मतलब केवल कागज पर मौजूद दस्तावेज नहीं होगा। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सिस्टम में दर्ज जानकारी, वर्चुअल रिकॉर्ड, ऑफसाइट स्टोरेज और क्लाउड आधारित डेटा भी इसके दायरे में आएगा।

इस बदलाव से उन मामलों में विशेष सुविधा मिल सकती है, जहां बैंकिंग लेनदेन, डिजिटल भुगतान या वित्तीय गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश करने की जरूरत होती है। आधुनिक बैंकिंग में डेटा का बड़ा हिस्सा डिजिटल सिस्टम और क्लाउड प्लेटफॉर्म पर संग्रहीत होता है। ऐसे में नया कानून मौजूदा तकनीकी व्यवस्था को कानूनी प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास करता है।

रिकॉर्ड प्रमाणित करने की प्रक्रिया होगी आसान

नए कानून में बैंकिंग रिकॉर्ड के प्रमाणीकरण को पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित और तकनीक-तटस्थ बनाने का प्रावधान है। रिकॉर्ड से जुड़े प्रमाणपत्रों को परिस्थितियों के अनुसार मैनुअल, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के जरिए प्रमाणित किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य अदालतों में बैंकिंग रिकॉर्ड पेश करने की प्रक्रिया को सरल बनाना और रिकॉर्ड की प्रामाणिकता साबित करने के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था उपलब्ध कराना है।

डिजिटल रिकॉर्ड को अदालत में साक्ष्य के तौर पर स्वीकार किए जाने के साथ उसकी विश्वसनीयता और सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होगी। नए कानून में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड की प्रमाणिकता से जुड़ी कई शर्तें निर्धारित की गई हैं। इनमें कंप्यूटर या संबंधित सिस्टम का उचित तरीके से काम करना, अधिकृत तरीके से डेटा दर्ज किया जाना, रिकॉर्ड को अनधिकृत बदलाव से सुरक्षित रखना और डेटा ट्रांसफर की सुरक्षा जैसे पहलू शामिल हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अदालत के सामने पेश किया गया डिजिटल रिकॉर्ड विश्वसनीय और सुरक्षित हो।

बैंक अधिकारियों को भी मिलेगी राहत

नए कानून में उन परिस्थितियों को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान हैं, जब बैंक किसी मुकदमे में स्वयं पक्षकार नहीं है। ऐसी स्थिति में बैंक के अधिकारियों को केवल रिकॉर्ड पेश करने या गवाही देने के लिए अनिवार्य रूप से अदालत में बुलाने पर सीमाएं रहेंगी। हालांकि, यदि अदालत को रिकॉर्ड की सटीकता या प्रामाणिकता पर गंभीर संदेह हो, नियमित रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया में बाधा आई हो या बैंक ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया हो, तो विशेष कारण दर्ज करके अधिकारी या मूल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया जा सकता है।

केंद्र सरकार को नए कानून के प्रावधानों को जरूरत के अनुसार अन्य वित्तीय संस्थानों या उनकी विशेष श्रेणियों पर लागू करने का अधिकार भी दिया गया है। सरकार अधिसूचना के माध्यम से ऐसे संस्थानों के लिए अलग शर्तें, अपवाद या आवश्यक संशोधन तय कर सकती है। Bankers Books Evidence Act 2026 के लागू होने के साथ 1891 में बनाए गए पुराने बैंकिंग साक्ष्य कानून को निरस्त कर दिया जाएगा। हालांकि, पुराने कानून के तहत पहले से पैदा हुए अधिकारों और दायित्वों तथा चल रही जांच या कानूनी कार्यवाही पर इसका असर नहीं पड़ेगा और उन्हें संरक्षित रखा जाएगा।

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