बरेली बना देश का पहला कार्बन निगेटिव छावनी क्षेत्र, हर साल 60 हजार टन कार्बन सोख रहा कैंट

बरेली छावनी देश का पहला कार्बन निगेटिव कैंट क्षेत्र बन गया है। यहां का इकोसिस्टम हर साल करीब 60 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर रहा है।

बरेली छावनी परिषद ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए देश का पहला कार्बन निगेटिव छावनी क्षेत्र बनने का गौरव प्राप्त किया है। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार यहां का इकोसिस्टम हर वर्ष लगभग 60 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण से अवशोषित कर रहा है।

बरेली: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में बरेली छावनी परिषद ने एक नई मिसाल कायम की है। घने हरित क्षेत्र, आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली और जल संरक्षण परियोजनाओं के दम पर बरेली देश का पहला कार्बन निगेटिव छावनी क्षेत्र बन गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यहां की प्राकृतिक और तकनीकी व्यवस्थाएं वातावरण से उत्सर्जन की तुलना में कहीं अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर रही हैं।

पर्यावरण संरक्षण में बरेली ने रचा नया इतिहास

बरेली छावनी परिषद ने देशभर के छावनी क्षेत्रों के लिए एक नया मानक स्थापित किया है। वर्षों पुराने वृक्षों के संरक्षण, हरित पट्टियों के विस्तार और आधुनिक पर्यावरणीय परियोजनाओं के कारण यह क्षेत्र कार्बन निगेटिव श्रेणी में पहुंच गया है।

बरेली बना देश का पहला कार्बन निगेटिव छावनी क्षेत्र, हर साल 60 हजार टन कार्बन सोख रहा कैंट

वैज्ञानिक संस्थान टेरी (द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट) द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि बरेली छावनी क्षेत्र हर वर्ष लगभग 60 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन को अवशोषित करने की क्षमता रखता है। यह मात्रा यहां होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन से अधिक है, जिसके कारण यह क्षेत्र कार्बन निगेटिव माना गया है।

घने जंगल और हरित क्षेत्र बने सबसे बड़ी ताकत

बरेली कैंट की सफलता के पीछे इसके विशाल हरित क्षेत्र और पुराने वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक संसाधनों का विस्तृत परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि यहां की मिट्टी और घने वृक्ष बड़ी मात्रा में कार्बन को संग्रहित करने की क्षमता रखते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य करने वाले ये हरित क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी मदद कर रहे हैं। यही कारण है कि बरेली छावनी का पर्यावरणीय संतुलन अन्य शहरी क्षेत्रों की तुलना में बेहतर माना जा रहा है।

वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से मिल रही हरित ऊर्जा

छावनी क्षेत्र में स्थापित वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट भी इस उपलब्धि का प्रमुख आधार बना है। इस संयंत्र में प्रतिदिन 35 से 40 टन कचरे का प्रसंस्करण कर बिजली और बायो-सीएनजी जैसी हरित ऊर्जा तैयार की जा रही है।

इस व्यवस्था से न केवल कचरे के निपटान की समस्या कम हुई है, बल्कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली है। इससे कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

जल संरक्षण और एसटीपी ने बदली तस्वीर

बरेली छावनी परिषद ने जल संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। क्षेत्र में छह एमएलडी क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है, जो नालों और सीवर के पानी को शुद्ध कर दोबारा उपयोग योग्य बनाता है।

इससे स्थानीय जलाशयों और नदियों में प्रदूषण कम हुआ है। साथ ही छावनी क्षेत्र के सरोवरों और जल स्रोतों की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिला है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे शहरी जल प्रबंधन का प्रभावी मॉडल मान रहे हैं।

घरों तक पाइपलाइन से पहुंचेगी बायोगैस

छावनी परिषद अब एक और महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। इसके तहत वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से उत्पादित शुद्ध कंप्रेस्ड बायोगैस को पाइपलाइन के जरिए सीधे घरों और सैन्य आवासों तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है।

यह व्यवस्था पारंपरिक एलपीजी सिलेंडरों का विकल्प बन सकती है। इसके लागू होने से कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा लागत दोनों में कमी आने की उम्मीद है।

अन्य शहरों के लिए बनेगा मॉडल

बरेली छावनी की इस उपलब्धि को अब देश के अन्य छावनी क्षेत्रों और शहरों के लिए मॉडल के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर और मेरठ जैसे बड़े छावनी क्षेत्रों में भी इसी प्रकार के एकीकृत कचरा प्रबंधन और कार्बन मूल्यांकन मॉडल लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया गया तो शहरी क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करने और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है। बरेली ने यह साबित कर दिया है कि योजनाबद्ध प्रयासों और तकनीक के बेहतर उपयोग से विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है।

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