Supreme Court of India ने बुधवार को एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में ‘बहुसंख्यकवाद’ संविधान से
ऊपर नहीं हो सकता।
नई दिल्ली: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में “बहुसंख्यकवाद” संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई धार्मिक प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ जाती है, तो न्यायपालिका को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
यह टिप्पणी नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।
संवैधानिक लोकतंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत केवल बहुमत आधारित लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक संवैधानिक लोकतंत्र भी है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यदि बहुमत किसी निर्णय का समर्थन करता है, तब भी उस निर्णय को संविधान की कसौटी पर परखा जाना आवश्यक है।
जस्टिस जॉयमल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत की चिंता “बहुसंख्यकवाद” से नहीं, बल्कि इस बात से है कि कहीं बहुसंख्यकवाद संविधानवाद पर हावी न हो जाए। उन्होंने इसे संवैधानिक व्यवस्था की “लक्ष्मण रेखा” बताया।
किन मामलों पर हो रही थी सुनवाई?
सुप्रीम कोर्ट जिन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, उनमें धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक परंपराओं की संवैधानिक वैधता और विभिन्न समुदायों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा जैसे मुद्दे शामिल हैं। सबसे प्रमुख मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-सदस्यीय पीठ ने 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक बताते हुए हटाने का फैसला सुनाया था। अब इस विषय से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर बड़ी पीठ विचार कर रही है।

केंद्र सरकार ने क्या दलील दी?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धार्मिक सुधारों का कार्य मुख्य रूप से विधायिका का है, न कि अदालतों का। उन्होंने तर्क दिया कि समाज में बदलाव धर्म और समाज के भीतर से आते हैं और संसद के माध्यम से लागू किए गए कानूनों को अधिक व्यापक स्वीकृति मिलती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “सती प्रथा” जैसी सामाजिक बुराइयों को कानून बनाकर समाप्त किया गया था।
उनके अनुसार, संविधान ने सुधार का दायित्व सरकार और विधायिका को सौंपा है। तुषार मेहता ने यह भी कहा कि किसी कानून को पारित करने से पहले विशेषज्ञों, समितियों और विभिन्न हितधारकों से परामर्श लिया जाता है, इसलिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से किए गए सुधार अधिक प्रभावी और स्वीकार्य होते हैं।
न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल
केंद्र की दलीलों पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने असहमति जताई। उन्होंने पूछा कि क्या धार्मिक मामलों को केवल इसलिए विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र बहुमत पर आधारित है? जब तुषार मेहता ने कहा कि “लोकतंत्र का अर्थ बहुमत होता है”, तब जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि भारत का लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों द्वारा संचालित व्यवस्था है।
कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी धार्मिक प्रथा या सामाजिक व्यवस्था से संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो। सुनवाई के दौरान अदालत ने हिंदू धर्म की प्रकृति पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि हिंदू धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे एक “जीवन शैली” के रूप में भी देखा जाता है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष धार्मिक अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि घर में दीपक जलाना भी किसी व्यक्ति की आस्था का पर्याप्त प्रतीक हो सकता है।









